Tuesday, 23 December 2025

जीवन से जूझते लोक का यथार्थ

 डॉ विद्याभूषण

 

नवें दशक के लोकप्रिय एवं महत्वपूर्ण कथाकार कैलाश बनवासी के तीन कहानी संग्रह लक्ष्य एवं अन्य कहानियाँ’, ‘बाजार में रामधन’, ‘पीले कागज की उजली इबारतसहित लौटना नहीं हैउपन्यास प्रकाशित हो चुका है। इन संग्रहों में अनेकों महत्वपूर्ण कहानियाँ मौजूद हैं जिन्होंने हिन्दी कथा साहित्य को समृद्ध किया है। इनका चौथा कहानी संग्रह प्रकोप एवं अन्य कहानियाँकई मायनों में महत्वपूर्ण है। जहाँ समकालीन कहानी का केन्द्र मध्यवर्गीय जीवन बोध होता जा रहा है वहीं उन्होंने निम्नवर्गीय चरित्रों को अपनी कहानियों के केन्द्र में रखा है। इस संग्रह की संपूर्ण कहानियाँ आम कहानियों से हटकर हैं। इनकी यह खासियत है कि यह हमारे आस-पास के जीवन से ली गई हैं। जिन चीजों को हम देखते हैं, परखते हैं, महसूस करते हैं, जो हमारे जीवन के प्रतिदिन का जाना पहचाना हिस्सा है, कैलाश जीवन और समाज के उन्हीं संदर्भों का सूक्ष्म परीक्षण करते हैं और परीक्षण उपरांत ही अपनी कहानियों को गढ़ते हैं। पेशे से शिक्षक होने के कारण उनके जीवन का अधिकांश समय ग्रामीण क्षेत्र में गुजरा है इसलिए उन्हें अपनी जमीन से, आसपास के माहौल से, विभाग एवं विभागीय अमले से जीवन के खट्टे-मीठे अनुभव प्राप्त हुए हैं जो इनकी कहानियों में स्पष्ट रूप से दिखाई देते हैं। इनकी कहानियों में बेवजह की उठापटक दाँव-पेंच व प्रपंच नहीं है जिससे जीवन की गहन अनुभूति और वैचारिक प्रतिबद्धता स्वस्फूर्त ही अभिव्यंजित होती है। ये कहानियाँ समकालीन समाज में व्याप्त ज्वलंत समस्याओं सहित युगीन सच्चाईयों से भी पाठकों को रूबरू कराती हैं।

    संग्रह की पहली कहानी गाँव: कुछ दृश्यमें दर्शाया गया है कि जहाँ शहरों में चमचमाती अट्टालिकाएँ, दुकानें, मॉल्स, मल्टीप्लेक्स तेजी से निर्मित हो रहे हैं, जीवन शैली में हो रहे बदलाव, शहरों की चकाचौंध में फँसा व्यक्ति आधुनिकीकरण और बाजारू उत्पादों के गिरफ्त में फंसकर केवल अपने जीवित होने का एहसास कर पा रहा है, वहीं इन सबसे दूर ग्रामीण, श्रमिक, कामगार, युवा एवं वृद्ध स्त्रियाँ मौसमों की मार का निडरतापूर्वक मुकाबला कर अपने दैनिक जीवन के कार्यों का निपटारा करती हुई मेहनतकश कार्यों को भी पूरी तत्परता के साथ करती हैं। इनके बीच आपसी सहचर्य का एकमात्र माध्यम हँसी-ठिठोली ही होता है। वे सभी इसमें डूबकर आपस में एक-दूसरे के प्रति सहज अपनापन रखते हैं जैसे वे एक परिवार का हिस्सा हों। यह कहानी इन्हीं ग्रामीण कामगार स्त्रियों की विसंगतियों को व्यक्त करती है। साथ ही, इन स्थितियों के विरूद्ध संघर्ष करने की प्रेरणा देती है। यहाँ श्रम और संघर्ष का सौंदर्य देखते ही बनता है। यह कहानी सरल, सहज होने के बावजूद अपनी दृश्यात्मक अभिव्यक्ति के कारण पाठकों को प्रभावित करती हुई समूचे ग्रामीण परिवेश को अपनी रचनात्मकता से जीवंत कर देती है।

 

    अव्यक्त प्रेम की संजीदा अभिव्यक्ति है संग्रह की दूसरी कहानी प्रेम अप्रेम। नए-नए शिक्षक बने अल्हड़ युवा और भोली-भाली ग्रामीण युवती की मुलाकात बस यात्रा के दौरान होती है, जहाँ हुई बातचीत से वे एक-दूसरे के प्रति आकर्षित होते हैं। इस प्रेम की पुष्टि गाँव के मंडाई मेले में होती है, जहाँ युवती द्वारा युवा शिक्षक को तीन सफेद बिल्लियों का पोस्टर भेंट स्वरूप दिया जाता है। शिक्षक द्वारा पोस्टर को प्रेम-पत्र समझा जाता है। इसी जिज्ञास में कहानी बिना किसी प्रेमाकार लिए तब खत्म हो जाती है जब उस युवती को गाँव में आए अकाल की वजह से पलायन करना पड़ता है। कथाकार ने इस कहानी के माध्यम से छत्तीसगढ़ में पिछले कुछ वर्षों में महत्वपूर्ण समस्या बनकर उभरी पलायन की समस्या पर बड़ी गहराई से चिंता व्यक्त की है। साथ ही, युवा पीढ़ी के तमाम आधुनिक आचार-व्यवहार के बीच भी प्रेम के उद्दात्त मूल्यों को बचाने का भरसक प्रयास किया है।

 

    कहानी प्रकोपसंग्रह की प्रतिनिधि रचना है। यह कहानी भारतीय कृषक जीवन की तकलीफों, त्रासदियों, विद्रूपताओं, विडम्बनाओं के साथ ही उनके परिवार के साथ होने वाले समस्त अमानवीय व्यवहार के सच को भी उद्घाटित करती है। हमारा देश तकनीकी विकास के चरमोत्कर्ष पर है। फिर भी विडम्बना है कि भारतीय ग्राम अब भी अपना संपूर्ण विकास नहीं कर पाया है। इन ग्रामों में निवासरत कृषक रोग, शोक, विवाद, व कर्ज से ग्रसित हैं। तकनीकी रूप से सक्षम कृषकों को छोड़कर शेष पूर्ण रूप से मानसून पर ही निर्भर हैं। वनों की अंधाधुंध कटाई ने इस संकट को और अधिक गहरा दिया है। मानसून पर निर्भर कृषकों को कम व अधिक वर्षा के साथ ही बिजली, खाद, बीज, कीटनाशक सहित प्राकृतिक प्रकोपों जैसी समस्याओं से भी जूझना होता है। इन्हीं समस्याओं से जूझता प्रकोपकहानी का प्रमुख पात्र इतवारी जो कि भारतवर्ष के अन्य कृषकों की ही तरह है। ग्राम के ही दीनानाथ साहू से चार एकड़ जमीन फसल उगाने हेतु किराये पर लेता है समस्त परिवार द्वारा उस जमीन पर जी-तोड़ मेहनत कर फसल उगाता है। फसल उगने पर मानसून दगा दे जाता है और अकाल की स्थिति निर्मित हो जाती है। क्षेत्र में सरकार द्वारा पानी की कोई व्यवस्था नही की जाती क्षेत्रीय विधायक द्वारा पानी की व्यवस्था करने के संबंध में दिया गया आश्वासन केवल आश्वासन ही सिद्ध होता है। परेशान इतवारी द्वारा पत्नि के समस्त गहने गिरवी रख पानी की व्यवस्था की जाती है पानी पाकर फसलें लहलहा उठती है किन्तु फसल कटने से ठीक पहले भूरा माहो नामक बिमारी की चपेट में आ जाती है और कटने के लिए तैयार खड़ी फसल पूरी तरह तबाह हो जाती है। गले तक कर्ज में डूबा इतवारी इस घटना से विक्षिप्त सा हो जाता है और अंततः आत्महत्या कर लेता है।

 

    इस देश की सबसे बड़ी विड़म्बना है कि उसका अन्नदाता ही कर्ज में डूबकर आत्महत्या करने को विवश है। सरकारी तंत्रों की नसों में फैला भ्रष्टाचार का रक्त कैंसर पूरी तरह लाईलाज बीमारी का रूप धारण कर चुका है वह केवल आश्वासनों एवं झूठे वादों पर ही सीमित होकर रह गया है। शासन के पास न तो कृषकों के लिए कोई ठोस नीति है और न ही उन्हें होने वाले नुकसान की भरपाई के लिए कोई अच्छी योजना, यदि कुछ है भी तो उसमें इतने पेंच हैं कि सही समय पर उसका लाभ प्राप्त कर पाना कृषकों के लिए संभव नही हो पाता, बेचारा कृषक झूठे आश्वासनों पर विश्वास कर सर्वस्व लुटा अपने आपको ठगा सा महसूस करते हंै। वैसे भी ग्रामीण समाज में धार्मिक आस्था, अंधविश्वास, जातिगत व्यवस्था जैसे विषैले सर्प अपना फन फैलाये कृषकों को डसने को तैयार बैठे हैं ग्रामीण सामाजिक ढांचा पूरी तरह चरमरा गया है। कहानी प्रकोपइन्हीं सब भ्रष्ट व्यवस्थाओं की पोल खोलती है, इस कहानी का सबसे मार्मिक स्थल हैं इतवारी की लाश को पोस्टमार्डम उपरांत थाने से छुड़वाने हेतु उसके बेटे आजू को थानेदार मिश्रा के महत्वहीन व तकलीफ देह प्रश्नों के उत्तर देने पड़ते हैं मिश्रा जी का दूसरे दिन तीन सौ रूपये मिलने की प्रत्याशा में ही लाश ले जाने की बात कहना, आजू द्वारा अपना घर गिरवी रख तीन सौ रूपये का इंतजाम करना संवेदनशील पाठकों को गहरे से विचलित करता है।

 

भ्रष्टाचार की नाजायज औलादें थानेदार मिश्रा जैसे पात्र महान उपन्यासकार पे्रमचंद के उपन्यास गोदानकी उस घटना का स्मरण कराता है जब होरी की मृत्यु उपरांत गोदान की रस्म निभाने के दबाव में ब्राम्हणों को होरी की मृत्यु का कोई शोक नही होता बल्कि उन्हें दकियानूसी रीति रिवाजों के र्निवहन हेतु किये जा रहे गोदान का इंतजार होता है वैसे ही थानेदार मिश्रा का इतवारी की लाश ले जाने के लिए तीन सौ रूपये की माँग करना अमानवीयता का चरमोत्कर्ष है। कृषकों की ऐसी दुर्दशा और खेती के संकट के सच को उद्घाटित करती जनकवि धूमिल की ये पंक्तियाँ आज भी कालजयी प्रतीत होती हैं।

   

    इतनी हरियाली के बावजूद/अर्जुन को नही मालूम

    उसके गाल की हड्डी क्यों उभर आई/उसके बाल सफेद क्यों हो गये

    लोहे के दुकान में बैठा आदमी सोना/और इतने बड़े खेत में खड़ा आदमी मिट्टी क्यों हो गया है।

 

    भारतीय समाज के उच्छंृखल और अमानवीय विकास ने भ्रष्ट, अनैतिक, संवेदनहीन, अश्लील और अराजक युवा वर्ग को जन्म दिया है कहानियाँ शिविरएवं संतरेइन्ही अराजक, लम्पट व धूर्त युवाओं के समूह द्वारा किये जा रहे पल-पल के आचार-विचार व व्यवहारों को समग्रता के साथ व्यक्त करती है। यह वर्ग ग्रामीण जनों को अत्यंत हेय दृष्टि से देखता है इनकी नजरों में ग्रामीणों की कोई इज्जत व आत्मसम्मान नहीं हैं यह वर्ग हमेशा उनके आत्मसम्मान को ठेस पहुँचाने हेतु प्रयासरत होता है। अपनी झूठी आन, बान, शान के मद में चूर इन युवाओं का ना तो कोई अतीत है और ना ही कोई भविष्य ? इन लम्पट युवाओं का सामना जब अपने आत्मसम्मान के प्रति सचेत और सतर्क ग्रामीणों से होता है तो उनका प्रतिरोध एक चुनौती के रूप में उभरता है।

 

    कहानी शिविरडाॅ. वर्मा के नेतृत्व में लगे एन.एस.एस. यानी राष्ट्रीय सेवा योजना के गाँव मे लगे शिविर की है, जिसमें आये कालेज के युवा छात्रों द्वारा ग्रामीण स्त्रियों और युवतियों पर अश्लील इशारे करना और छेड़खानी करने से शुरू होती है और छात्र सुरेश द्वारा कथा पात्र बसंत की छोटी बहन पर किये गये बलात्कार की नाकाम कोशिश पर खत्म होती है बात घर तक पहुँचने पर बसंत के काका एवं ग्रामीण द्वारा आरोपी छात्र सुरेश और उसके साथियों की जमकर पिटाई की जाती है।   बदले की भावना से ग्रसित सुरेश और उसके साथियों द्वारा ग्रामीणों को देख लेने की बात कहता है। इस घटना का ज्ञान जब बसंत को होता है तो उसे सुरेश द्वारा अपनी पिटाई की आशंका घेर लेती है उसकी आँखों के सामने वह दृश्य उभरने लगता है जब बिना किसी बात के सुरेश द्वारा एक गरीब छात्र को बुरी तरह पीटा गया था। सुरेश से छात्र तो छात्र प्रोफेसर तक भयभीत होते हैं। आंतरिक अंर्तद्वंद्वं में फँसा बसंत है कभी गाँव से शहर कालेज आने-जाने की युक्तियाँ सोचता तो कभी अपनी छोटी बहन को कोसता नशे में गाँव वालों की ओर से सुरेश से माफी माँगने शिविर की ओर चल पड़ता है।

 

    कहानी संतरेरेलगाड़ी के डिब्बे में संतरे बेचने वाली महिलाओं के साथ द्विअर्थी संवादों में वार्तालाप कर मजे लेना उन पर अश्लील फब्तियाँ कसना, अश्लील इशारे करना और मौका मिलने पर उन महिलाओं को छूने की चेष्टा कर रहें नीचे की बर्थ में बैठे दो युवा जिनके उपर की बर्थ में बैठे लेखक कवि कृपाशंकर चकोर को ये सब चीजें नागवार गुजरती है भीतर ही भीतर उनके मन में आक्रोश उत्पन्न होता है सारे डिब्ब में लगभग इसी प्रकार के हालात होते हैं, चाहकर भी कोई इन सबका विरोध नही कर पाता, कुछ देर बाद जब युवकों द्वारा एक संतरेवाली महिला को छूने की चेष्टा की जाती है तो महिला द्वारा इन युवाओं का प्रतिरोध किया जाता है सारा माजरा समझ कृपाशंकर चकोर अपने भीतर उमड़ रही प्रतिरोध की अग्नि उस संतरे वाली महिला के भीतर पाकर अत्यंत प्रसन्न होते हैं। सरल व शांत स्वभाव की संतरेवाली महिला की अप्रत्याशित आक्रामकता और प्रतिरोध के आगे धूर्त, लम्पट, अराजक आधुनिक युवाओं का जोश ठंडा हो जाता है उनके होश ठिकाने आ जाते हैं संतरेवाली महिला के प्रतिरोध उपरांत रेलगाड़ी के डिब्बे में डरे सहमें आतंकित लोगों की हलचल और सक्रियता वापस लौट आती है। धूर्त, अराजक युवकों के समूह का आतंक खत्म हो जाता है। कृपाशंकर चकोर उसी संतरेवाली महिला से संतरा खरीद आस्वादन करते हुए मन ही मन एक आधुनिक बर्बर हमले के प्रतिरोध में अपनी विजयघोष का एहसास करते हैं।

 

    कहानी गोमती एक नदी का नाम हैवर्तमान आर्थिक समय में समाज के भीतर बचे जीवन मूल्यों को टटोलती है। कहानी ग्रामीण मजदूरन स्त्री गोमती जिसका पति चोरी के इल्जाम में जेल में बंद है जिसका जुर्म है धान कोचिया का पाँच बोरा धान अपनी मजदूरी के एवज में बिना पूछे बेचना। तीन बच्चों की माँ गोमती को परिवार के पालन-पोषण हेतु बाड़ी में काम करना पड़ता है काम पर बने रहने के लिए मजबूरीवश अपने बाड़ी मालिक द्वारा किये जा रहे छोटे-मोटे शोषण को सहना पड़ता है आर्थिक अभाव से ग्रसित गोमती अंततः अपनी देह तक सौंपने को तैयार हो जाती है। आधुनिक समय में व्यक्ति के मन में जरूरतमंद व समर्पित स्त्री के प्रति प्रेम और संवेदना का कोई स्थान नही होता वह हर हाल में ऐसी स्त्री को पाने की चेष्टा करता है। किन्तु यह कहानी अंत में अपने मर्म को प्रकट करती है जब बाड़ी मालिक द्वारा गोमती की देह को पाने की तीव्र इच्छा रखने पर भी कमरे में अकेले मिलने पर गोमती द्वारा बच्चे का जिक्र करने पर उसे अपने बिस्तर से भगा देता है साथ ही दुबारा काम पर आने से भी मना कर देना जैसा अविश्वसनीय कृत्य लेखक द्वारा कहीं न कहीं मानवीय मूल्यों को बचा लेने का सार्थक प्रयास है।

 

    ग्रामीण व्यक्ति हर तरह से सरल, सहज और भोला-भाला होता है इन ग्रामीण जनों के साथ कोई भी शहर का जालसाज व्यक्ति आसानी से छल कर सकता है यही होता है। कहानी काका के जीवन की एक घटनामें ग्रामीण वृद्ध स्त्री काकी जो कि अपने सिर पर दूध, दही, घी, मही, बेचकर अपने परिवार का पालन-पोषण करती है दुकान में हुई बहस पर गुस्से में आकर दुकान में बैठे युवक द्वारा काकी का सिर फोड़ दिया जाता है युवक के पिता द्वारा काकी को अस्पताल में भर्ती कराया जाता है पुलिस में रिर्पोट दर्ज न करने के एवज में वह अस्पताल में हो रहे खर्च उठाने को तैयार हो जाता है साथ ही उसके द्वारा चार सौ रूपये भी जमा कराया जाता है, किन्तु वृद्ध ग्रामीण काकी और काका अपने आप को उस समय ठगा सा महसूस करते हैं जब निर्धारित तिथि पर वह दुकानदार अस्पताल का आगामी खर्चा देने नहीं आता इस खर्च को वहन करने में काकी के गहने तक गिरवी रखने पड़ते हैं। यह कहानी आधुनिक समाज में खत्म हो रहे मानवीय मूल्यों को बड़ी मार्मिकता से रेखांकित करती हुई, शहरों में रहने वाले धूर्त, चालाक और मौकापरस्त लोगों की गहरी पड़ताल करती है साथ ही ऐसे लोगों से हमेशा सतर्क व सचेत रहने की प्रेरणा भी देती है।

    छटवें वेतनमान के समय में दो कौड़ी का आदमीइस संग्रह की सबसे मार्मिक कहानी है। यह एक अपंग किन्तु कर्मठ, जुझारू, ईमानदार, मानसेवी (भृत्य) संतोष के जीवन का हौलनाक बयान है। आर्थिक तंगी, शारीरिक अपंगता, नैतिक बोध, और स्वभावगत ईमानदारी इस मूल्यहीन समाज में उसकी स्थिति को और अधिक दयनीय व दारूण बना देती है। स्कूल के प्राचार्य व नियमित शिक्षकों द्वारा नित नये हथकंडे अपनाकर उस पर दबाव बनाया जाता है कि वह दिन में कार्य करने के अलावा रात में स्कूल की चैंकीदारी भी करें, संतोष द्वारा वेतन बढ़ाने की मांग और नियमित शिक्षकों का प्रतिरोध करने पर अनावश्यक दोषारोपण कर उसका मासिक मानदेय तक काट दिया जाता है इस घटना से आहत होकर संतोष मानसेवी (भृत्य) की नौकरी छोड़कर जीवन जगत में व्याप्त तमाम अनैतिक कार्यों में लग जाता है। यह कहानी अंत में एहसास करा ही देती है कि जिसके पास पद, पैसा, रूतबा नही है वह इस आधुनिक समय में हर जगह मिसफीट होता है, साथ ही अपने आपको देश के सिरमौर व समाज निर्माता समझने वाले निकम्मे, निठल्ले, चापलूस शिक्षकों के गैर शिक्षकीय घृणित व अनैतिक कृत्यों सहित उनके द्वारा किये जाने वाले शोषणों के सच को भी उद्घाटित करती है।

 

    पुरूष प्रधान समाज में पुत्री को जन्म देना एक अभिशाप से कम नहीं है। ज्ञात होने पर उसकी गर्भ में ही हत्या तक के प्रयास होने लगते हैं ऐसा ही कुछ कहानी उसके दरबार मेंकी नायिका डाॅली के साथ घटित होता है। शादी उपरांत पहली पुत्री होने पर पति व सास द्वारा उसे व मायके वालों को तरह-तरह के हथकंडे अपनाकर अपमानित व प्रताड़ित किया जाता है। इसका अंत तब होता है जब उसके ससुराल वाले ग्रामीण साधवी माताजी के दरबार में पहुँचते है जहाँ अपने आपको साधवी मानने वाली माताजी डाॅली के भाई पर मोहित हो उसके सामने अपने साथ रात गुजारने का प्रस्ताव रखती है स्वीकृति उपरांत एवज में माताजी द्वारा डाॅली के ससुराल वालों से कहा जाता है की वह घर की लक्ष्मी है उसे प्रताड़ित करने पर उनके घर की सुख-समृद्धि, ऐश्वर्य नष्ट होने का भय है उसे सुखी रखने पर ही घर में सुख, शांति रहेगी।

 

    यह कहानी वैज्ञानिक युग में धर्म और आस्था के नाम पर फैले अंधविश्वास के सहारे समाज में अपनी गहरी पैठ बना चुके बाबाओं और माताओं के कुटिल चरित्र को उजागर करती है। यह कहानी समाज के लिए नासूर बन चुकी इनकी धंधेबाजी, व्यक्ति को संतुष्ट करने हेतु रचे गए प्रपंच एवं उनके छद्म चालों की कलई तो खोलती ही है साथ ही पुत्र-पुत्री भेदभाव व कन्या-भ्रूण हत्या जैसी ज्वलंत समस्या को भी बड़ी संजीदगी से प्रस्तुत करती है। इस तरह कहा जा सकता है कि संपूर्ण मानव जाति के जीवन मूल्य जैसे नैतिकता, संवेदनशीलता, मानवीयता, संघर्ष व प्रतिरोध इस संग्रह की कहानियों में प्रमुखता से मौजूद हैं।

    कैलाश बनवासी की भाषा सरल, सहज, स्पष्ट होने के साथ-साथ पात्रानुकूल भी है जो इन कहानियों की सबसे बड़ी ताकत है। कहानियों में पात्र जिस प्रकार के होते हैं वे उनसे उसी प्रकार की भाषा का प्रयोग कराते हैं जिससे पाठकों के मन में पात्र एवं उसकी मानसिकता की स्पष्ट छवि उभरती है और वे जीवंत हो उठते हैं। कहानियों में छोटे-छोटे वाक्य एक-दूसरे से जुड़कर एक सधी हुई भाषिक संरचना का निर्माण करते हैं। बीच-बीच में मुहावरों, कहावतों एवं छत्तीसगढ़ी के शब्दों का प्रयोग भाषा में नई ताजगी का अनुभव कराते हैं। वे बहुप्रचलित भाषा के खिलंदड़ेपन से भी अपनी कहानियों को भरसक बचाते हैं।

    इस संग्रह की समस्त कहानियाँ सरल, सहज शिल्प में कही गई हैं, शिल्प और भाषा में किसी प्रकार की कृत्रिमता नहीं दिखाई देती है। कहानियों की विषय-वस्तु अप्रत्याशित फैलाव लिए नहीं वरन् बेहद लघु एवं वांछित कलेवर में सुसंगठित हैं। कहानी गाँव: कुछ दृश्यअलग फार्म में अवश्य है किन्तु कहानी सीधे-सपाट वर्णनात्मक शिल्प में होते हुए भी जिस तरह जीवन और प्राकृतिक दृश्यों को रचती है वह बेहद कलात्मक है।

 किसी भी समाज में लोक-जीवन का आधार गाँवों के लोग, उनके रीति-रिवाज, ईर्ष्या-द्वेष, मेल-मिलाप, उनका स्वभाव, गाँवों की संपूर्ण समस्याएँ, गाँव के अलग-अलग चरित्र, उनकी मानसिकता, खेत-खलिहान, बाग-बगीचे, पंचायत, चौपाल, राजनीति, हिंसा, गाँव के संस्कार, परम्पराएँ, नया ज्ञान, संचार माध्यम, शिक्षा, नगरों से संबंध के कारण उनमें आ रहे बदलाव आदि का समन्वय होता है। इस संग्रह की संपूर्ण कहानियों में लोक जीवन के समस्त सौंदर्य, उसकी विसंगतियों के साथ अभिव्यक्त हुए हैं। ये कहानियाँ लोक जीवन के सहज लोक पक्ष को रेखाँकित करती हुई उसके भीतर सक्रिय सामाजिक यथार्थ को भी परखती हैं। जहाँ लोक जीवन व संस्कृति को खत्म करने की साजिश चल रही है ये कहानियाँ उसके प्रतिरोध में उस लोक को बचाने की पुरजोर कोशिश करती हैं। अधिकांश कहानियाँ घटना प्रधान है, संपूर्ण घटनाएँ मोतियों की माला में गूँथी गई मोतियों की तरह ही एक दूसरे से अपने-आप जुड़ती जाती हैं।

    कैलाश बनवासी अपने समय, समाज एवं परिवेश के प्रति प्रतिबद्ध कथाकार हैं, जिसकी अभिव्यक्ति पूरी गंभीरता के साथ इनकी कहानियों में स्पष्ट रूप से परिलक्षित होता है। आधुनिकता के इस दौर में जब बहुत सारे लोग एक तरह से परास्त हो चुके हैं, हार की मानसिकता में हैं, ऐसे समय में इस संग्रह की कहानियाँ यह आश्वस्त करती हैं कि अभी भी कुछ है जो बचा है, सब कुछ खत्म नहीं हुआ है।

 

Tuesday, 9 December 2025

आँख भर आकाश

 आँख भर आकाशकाव्य संग्रह में आधुनिक जीवन की सबसे बड़ी समस्या को शामिल किया गया है वह समस्या है- ‘हाशिये के लोग

इस कविता संग्रह में संकलित कुछ कविताएँ देश के आधुनिक जन इतिहास का, स्वातन्त्रयोत्तर भारत का दहकता दस्तावेज हैं। मज़दूर वर्ग हमारे समाज का वह वर्ग है जिसकी ओर किसी का कोई ध्यान नहीं जाता। सब बस बड़े आदमी बनना चाहते हैं। कोई भी नीचे नहीं देखता कि गरीब मजदूर क्या चाहता है? वह भी तो आम आदमी की तरह रोटी, कपड़ा और मकान चाहता है। पर क्या उसे दो वक्त की रोटी नसीब हो पाती है? नहीं। क्यों? क्योंकि कोई उसकी ओर नहीं देखता। एक मजदूर सुबह से लेकर शाम तक मेहनत करता है फिर भी एक सुखी जिंदगी व्यतीत नहीं कर पाता क्योंकि हमारा समाज उसे नीची नजरों से देखता है।

हमारे देश के गरीब मजदूर के हालात से तो आप सभी वाकिफ ही होंगे। मजदूर की परिभाषा क्या है? दुःख, दरिद्रता, भूख, अभाव, कष्ट, मज़बूरी, शोषण और अथक परिश्रम- इन सबको मिला दें तो भारतीय मजदूर की तस्वीरें उभर कर आती हैं। भारतीय मजदूर दो वक़्त की रोटी और अपने परिवार का पालन पोषण करने के लिए कड़ी मेहनत करते हैं। उनकी तरफ कवि ने ध्यान खींचने का बख़ूबी प्रयास किया है जो एक समृद्ध समाज बना सके।

          बृजेश नीरज को ‘आँख भर आकाश’ कविता संग्रह के लिए शुभकामनाएँ!

-    विष्णु दुबे

Tuesday, 4 November 2025

ऐतिहासिक विजय: भारतीय महिला क्रिकेट टीम ने रचा विश्व कप का नया इतिहास

 दक्षिण अफ्रीका को हराकर भारत बना विश्व विजेता


आज का दिन भारतीय खेल इतिहास के स्वर्णाक्षरों में लिखा जाएगा। भारतीय महिला क्रिकेट टीम ने दक्षिण अफ्रीका को हराकर अपना पहला विश्व कप जीत लिया है। यह जीत केवल एक ट्रॉफी नहीं, बल्कि उस जज़्बे, संघर्ष और संकल्प की प्रतीक है जिसने वर्षों तक कठिनाइयों के बावजूद भारतीय महिलाओं को खेल के शिखर तक पहुँचाया। यह विजय हर उस बेटी को समर्पित है जो अपने सपनों के लिए समाज की बंदिशों से लड़ रही है।

--- डॉ प्रियंका सौरभ

भारतीय महिला क्रिकेट टीम ने आज दक्षिण अफ्रीका को हराकर वह कर दिखाया जो दशकों से भारतीय खेल प्रेमियों का सपना था। क्रिकेट का यह संस्करण केवल खेल नहीं रहा—यह महिलाओं की आत्मनिर्भरता, साहस और नेतृत्व का प्रतीक बन गया है। इस जीत ने भारतीय महिला खिलाड़ियों को न सिर्फ़ विश्व पटल पर स्थापित किया है, बल्कि पूरे राष्ट्र को यह संदेश दिया है कि समर्पण और मेहनत किसी भी बाधा को मात दे सकते हैं।

भारत की कप्तान हरमनप्रीत कौर के नेतृत्व में टीम ने न केवल खेल कौशल दिखाया, बल्कि मानसिक दृढ़ता और रणनीतिक क्षमता का भी अद्भुत उदाहरण प्रस्तुत किया। जब दक्षिण अफ्रीका जैसी मज़बूत टीम के सामने भारत उतरा, तो पूरे देश की निगाहें इस मुकाबले पर थीं।

भारतीय महिला क्रिकेट का इतिहास संघर्षों से भरा रहा है। एक समय ऐसा भी था जब महिलाओं के मैचों में दर्शकों की संख्या सैकड़ों में भी पूरी नहीं होती थी। परंतु 2025 में यह तस्वीर पूरी तरह बदल गई। घरेलू टूर्नामेंट्स, महिला आईपीएल (WPL), और युवा खिलाड़ियों के लिए बढ़ते अवसरों ने भारतीय टीम को एक नई ताकत दी। शेफाली वर्मा, स्मृति मंधाना, और दीप्ति शर्मा जैसी खिलाड़ियों ने न केवल मैदान पर कमाल किया, बल्कि नई पीढ़ी की प्रेरणा भी बनीं। आज की जीत में हर खिलाड़ी का योगदान महत्वपूर्ण रहा — चाहे वह अंतिम ओवर की गेंदबाजी हो या फील्डिंग में दिया गया असाधारण प्रदर्शन।

भारत ने पहले बल्लेबाजी करते हुए लगभग 298 रन का मजबूत लक्ष्य रखा। पारी की शुरुआत शेफाली वर्मा और स्मृति मंधाना ने दमदार अंदाज में की। मंधाना की शतक जैसी पारी ने टीम को मजबूत नींव दी, वहीं कप्तान हरमनप्रीत कौर ने मध्य क्रम में टीम को स्थिरता प्रदान की। फाइनल के दबाव में भी भारतीय गेंदबाजों ने संयम नहीं खोया। दीप्ति शर्मा और रेणुका ठाकुर ने सटीक गेंदबाजी से दक्षिण अफ्रीका को लक्ष्य से दूर रखा। अंतिम ओवरों में जब जीत और हार के बीच की दूरी कुछ गेदों की रह गई थी, तब पूरी टीम ने जिस धैर्य से खेला, वह भारतीय क्रिकेट की परिपक्वता को दर्शाता है।

इस जीत का महत्व केवल खेल तक सीमित नहीं है। यह जीत समाज में महिलाओं की भूमिका के प्रति दृष्टिकोण को बदलने वाली घटना है। लंबे समय तक खेल को पुरुष प्रधान माना जाता रहा, लेकिन आज भारतीय बेटियों ने यह साबित कर दिया कि खेल का मैदान अब किसी एक लिंग तक सीमित नहीं। यह विजय देश के ग्रामीण इलाकों में खेलने वाली उन लड़कियों के लिए प्रेरणा है, जो अब खुद को किसी भी सीमा में बंधा हुआ महसूस नहीं करेंगी।

भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (BCCI) और खेल मंत्रालय ने पिछले कुछ वर्षों में महिला क्रिकेट को सशक्त बनाने के लिए ठोस कदम उठाए हैं — समान वेतन नीति, बेहतर कोचिंग सुविधाएँ, और महिला आईपीएल जैसे प्रावधानों ने खेल में समान अवसरों को सुनिश्चित किया है। अब आवश्यकता है कि इस गति को बनाए रखा जाए। महिला खिलाड़ियों को न केवल सम्मान बल्कि स्थायी सुरक्षा, सुविधाएँ और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर निरंतर प्रतिस्पर्धा के अवसर मिलते रहें।

इस जीत ने भारत को एक नई जिम्मेदारी भी दी है। आने वाले वर्षों में भारत को न केवल इस प्रदर्शन को दोहराना है, बल्कि खेल की जड़ों को और गहरा करना है। स्कूल स्तर से लेकर विश्वविद्यालय तक, खेल शिक्षा और महिला खिलाड़ियों के लिए बेहतर बुनियादी ढाँचा तैयार करना समय की माँग है। साथ ही, मीडिया और दर्शकों को भी यह सुनिश्चित करना होगा कि यह उत्साह केवल एक दिन या टूर्नामेंट तक सीमित न रहे।

आज भारतीय महिला क्रिकेट टीम ने यह साबित कर दिया है कि "जहाँ इच्छा, वहाँ राह" कोई कहावत मात्र नहीं, बल्कि यथार्थ है। यह जीत केवल 11 खिलाड़ियों की नहीं, बल्कि पूरे भारत की है — उन परिवारों की, जिन्होंने अपनी बेटियों को सपने देखने की आज़ादी दी; उन कोचों की, जिन्होंने सीमित संसाधनों में भी प्रतिभा को निखारा; और उन दर्शकों की, जिन्होंने हर गेंद पर टीम का हौसला बढ़ाया।

2025 का यह वर्ष भारतीय खेलों के लिए ऐतिहासिक बन गया है। अब भारत की बेटियाँ विश्व की नई मिसाल हैं — जिनकी जीत ने हर भारतीय के दिल में गर्व, प्रेरणा और उम्मीद की लौ जगा दी है।

Thursday, 30 October 2025

मैं इसलिए लिखता हूँ..

 - सुरजीत सिंह

यह विवशता कहिए, शौक या फिर समकालीन मुद्दों पर एक सजग, जिम्मेदारी भाव से त्वरित दखल देने की स्वत: स्फूर्त प्रेरणा, किसी और विधा में मुझे खुद को व्यक्त करना आता नहीं है। जो लिखता हूँ, जिस तरह लिखता हूँ, वह व्यंग्य के निकट है, मैं इसे संयोग मात्र ही कहूँगा वरना व्यंग्य की पाठशाला का मैं रेगुलर विद्यार्थी कभी नहीं रहा, न बचपन से ऐसे अकादमिक संस्कार मिले कि स्वाभाविक रूप से व्यंग्य जैसी विधा को आत्मसात कर उसकी ओर प्रवृत्त हो पाता। यही वजह रही कि शुरुआती दौर में व्यंग्य लेखन अनायास ही शुरू हुआ। इसका मुहावरा मैंने कभी कहीं से सीखा नहीं। स्कूल-कॉलेज के दिनों में जाएँ तो यह जरूर रहा कि पाठ्य-पुस्तकों में परसाई या शरद जोशी की रचनाएँ पढ़ते थे, तो मुझे उनमें सर्वाधिक रस आता था।

शायद पाठ्य-पुस्तकों में पढ़ी गई परसाई की ठिठुरता गणतंत्र, भोलाराम का जीव जैसी व्यंग्य रचनाओं ने ही मेरे अंदर कहीं ऐसे बीज वपन किए कि आगे चलकर शब्द-विचार व्यंग्य रूप से पल्लवित-पुष्पित हुए। फिर मेरे स्वभावगत आग्रह से भी इस मत को धार मिली कि लेखक बदलाव का सबसे बड़ा वाहक हो सकता है। खासकर व्यंग्य तो अपनी मारक क्षमता के कारण व्यवस्था के फोड़े से मवाद निकालने का काम करता है। मेरी भी इच्छा थी कि ऐसी कलम का धनी बनूँ जो विसंगतियों की शल्य क्रिया कर सके।

अगर यही अंत:प्रेरणा है तो मन का आदेश मान पत्रकारिता में दाखिल हो गया। इसी के साथ पत्र-पत्रिकाओं में छिट-पुट व्यंग्य लिखने लगा। पहला व्यंग्य दैनिक नवज्योति में छपा था, वह खुशी अवर्णनीय है। वह रचना लिखने के पीछे भी कारण यह था कि अखबार के कॉलम में मैंने किसी का व्यंग्य पढ़ा, जिसे पढ़कर तुरन्त लगा, अरे, ऐसा तो मैं भी लिख सकता हूँ। बस भेज दी रचना। तीसरे ही दिन छप गई। उस दिन मैं राजस्थान यूनिवर्सिटी की लायब्रेरी से साइकिल पर उड़ता हुआ घर आया था। आते समय पाव भर जलेबी लेकर आया। वह हमारा सेलिब्रेशन था, जिसका अहसास आज भी नहीं भूलते। रेस्पॉन्स मिला, तो थोड़ा ज्यादा लिखने लगा। छपने में आनन्द आने लगा। इसके बाद तो ऐसा छपास रोग लगा कि प्रतिदिन ही लिखने की कोशिश करने लगा। जिस किसी दिन नहीं छपता, मायूसी छा जाती। छप जाती, उस दिन जोश से भर जाता। इससे जो पारिश्रमिक मिलता, उससे पढ़ाई का खर्चा चल जाता। लगभग दो साल तक मैंने भाई-बहनों के साथ पढ़ाई का खर्च लेखन से निकाला। इसके बाद राजस्थान पत्रिका में पत्रकार के रूप में नौकरी शुरू हो गई। बस, महज दो साल के धुआंधार व्यंग्य लेखन पर पेशेगत बाध्यताओं के कारण विराम लग गया। इस बीच दस साल से भी ज्यादा का ब्रेक रहा। पेशगत बाध्यताओं के कारण लाख चाहने के बाद भी लिख नहीं पा रहा था। रचनात्मकता खत्म हो रही थी। इसके बाद वर्ष 2014 के आरम्भ में हिम्मत कर फिर नियमित व्यंग्य लेखन की शुरुआत की। शुरुआत करते ही फिर वही प्रतिदिन कॉलम लिखने का जुनून। रोज छपे बिना चैन नहीं। 

इस मन:स्थिति से बाहर निकाला फेसबुक पर मिले व्यंग्यकार संतोष त्रिवेदी जैसे अग्रज, मित्र ने। वे अक्सर टोकते थे कि छपने का मोह त्यागो, अखबारी कॉलम से बाहर निकलो और लम्बी रचनाएँ लिखो। अब धीरे-धीरे जाकर इस मन:स्थिति से बाहर निकलने की कोशिश कर रहा हूँ। सोचता हूँ, काश! मुझे बचपन से संतोष त्रिवेदी जैसा कोई गुरु मिला होता, तो हो सकता है वह सब नहीं होता, जो मार्गदर्शन के अभाव में हुआ। ठोकरें खाकर सीखना अच्छी बात है, लेकिन निरन्तर ठोकरें भी नहीं खाई जा सकतीं, समय का भी अपना महत्व है।

यह मेरे साथ अजीब ही हुआ कि मुझे व्यंग्य लेखन के कहीं से संस्कार नहीं मिले। इसके पीछे संगत, सान्निध्य, सहयोग और साथ का नितांत अभाव रहा इसलिए अनगढ़ तरीके से लेखन किया। यह सोचकर आज लज्जा आती है कि मैंने महान व्यंग्यकारों को पढ़ा बाद में, लिखना पहले ही शुरू कर दिया। दो साल अखबारों में भरपूर लिख चुकने के बाद तक व्यंग्य की एक भी किताब पढ़ी नहीं थी। जब परसाई, शरद जोशी को पढऩा शुरू किया, तो लगा, लेखन ऐसा होना चाहिए। मुझे यह कहने में कोई हिचक नहीं कि मेरी एक समस्या रही है, मैं जिसे भी पढ़ता और प्रभावित होता, उसी की शैली में लिखने का मन करता। शरद जोशी की व्यंग्य शैली तो ऐसी भाई कि एक समय उनकी शैली की नकल करने की कोशिश करता था। इसका नुकसान यह हुआ कि आज तक मेरी स्वयं की कोई स्पष्ट शैली विकसित नहीं हो पाई है। अगर मुझ पर कोई अपराध कायम होता है, तो हाँ, मैं स्वीकार करता हूँ कि मैं प्रेरणा चोर हूँ, दूसरों के लिखे से भी प्रेरणा चुराता हूँ।

मेरा प्रिय विषय राजनीति है। राजनीति ही ऐसा व्यंग्य उर्वर प्रदेश है, जहाँ रोज विसंगतियाँ उपजती हैं। उनकी शल्य क्रिया व्यंग्यकार का काम है। यही वजह है कि आज राजनीति पर व्यंग्य लेखन का ज्यादा फोकस है। मैंने अभी-अभी व्यंग्य की पाठशाला में रेगुलर विद्यार्थी के रूप में प्रवेश लिया है, जहाँ व्यंग्य का ककहरा सीखने की कोशिश कर रहा हूँ। हाँ, मुझे सीखने और सलाहें मानने में कोई हर्ज नहीं है, बशर्ते कोई सिखाए, कोई दे!

- सुरजीत सिंह

Wednesday, 29 October 2025

कविता - एक भाव

 संध्या सिंह

 

बेचैन अन्धेरा

टकटकी लगाकर 
खिड़की से पूरब की ओर झाँकता रहा 
अभिमानी नींद
ऊँकडू बठी रही आँखों में 
और कतारबद्ध सपने
बाहर उनींदे से खड़े रह गए 
करवटों ने 
यादों के श्यामपट्ट पर 
कुछ सिलवटें लिखीं 
ख्यालों में खोई नज़र ....
पढ़ भी नहीं पायी थी ठीक से 
कि सूरज ....
लाल आँखें तरेरता हुआ आया 
और मिटा दिया सब कुछ 
उजाले के डस्टर से
और इस तरह 
फिर एक रात
बिना पढ़ी रह गयी

सामाजिक बदलाव में पत्र-पत्रिकाओं की भूमिका

 -    डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव

 

        पत्र-पत्रिकाओं का समाज के शिक्षित वर्ग से बड़ा ही घनिष्ठ संबंध है क्योंकि इन्हीं के माध्यम से हम समाज में हो रही घटनाओं, हलचलों, विकासोन्मुख कार्यों, नवीन खोजों के साथ ही साथ सामाजिक विद्रूपता से भी साहित्य की अनेक विधाओं द्वारा रू-बरू होते हैं। एक प्रकार से पत्र मानव के मानसिक व बौद्धिक छुधा को मिटाने का कार्य करते हैं। यह एक ऐसा मानसिक भोजन है जिसमें षट-रस नहीं अपितु नव रस हैं। हम इस साहित्य के माध्यम से केवल समाचार, घटना, विचार अथवा काल्पनिक कथाओं के इतिवृत्त से ही परिचित नहीं होते अपितु हमें उन पर विचार करने और विश्लेषण करने की प्रेरणा भी मिलती है। हम उन पर परिचर्चा करते हैं और एक समूह के अन्तर्गत अपनी भी एक पहचान बनाते हैं।

        भारत में पत्र का प्रार्दुभाव राजा राममोहन राय के अध्यवसाय से बंगाल मे सन् 1816 मे बंगाल गजटनाम के पत्र से हुआ। इसके अतिरिक्त उन्होंने मिरातुल’, ‘संवाद कौमुदीबंगाल हेराल्डनामक पत्र भी निकाले। किन्तु हिन्दी का प्रथम पत्र उदंत मार्तण्ड’ 30 मई 1926 को पं0 जुगुल किशोर शुक्ल के संपादन में प्रकाशित हुआ। इसके बाद बंगदूत’, ‘प्रजामित्र मार्तण्डसमाचार सुधा वर्षणकलकत्ता से ही प्रकाशित हुए। इनमें समाचार सुधा वर्षणदैनिक और अन्य पत्र साप्ताहिक थे। इसके बाद काशी से सुधाकरबनारस समाचार, आगरा से प्रजा हितेषीबुद्धि प्रकाश, बरेली से तत्वबोधिनी’ (साप्ताहिक), मालवा से मालवा’(साप्ताहिक), जम्मू से वृतान्त’ (मासिक), लाहौर से ज्ञान प्रदायिनी पत्रिका’ (मासिक) प्रकाशित हुई। हिन्दी पत्र-जगत में क्रान्ति की अवस्था तब आयी जब भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने सन् 18680 में साहित्यिक पत्रिका कवि वचन सुधाका प्रवर्तन किया। तदुपरान्त इन्होंने अपनी तीन अन्य पत्रिकाएँ हरिश्चन्द्र मैगजीनहरिश्चन्द्र चंद्रिकाबाल बोधिनीभी प्रकाशित की। इसके बाद हिन्दी पत्रिकाओं की बाढ़ सी आ गयी। इनमें बालकृष्ण भटटकी प्रदीप’, प्रताप नारायन मिश्र की ब्राह्मण’, मदन मोहन मालवीय की हिन्दोस्थान’, ‘अभ्युदयमर्यादा, मेहता लज्जाराम शर्मा की सर्वहित वेंकटेश्वर समाचार, बालमुकुन्द गुप्त की अखबारे चुनार,हिन्दी बंगवासीभारत मित्र, आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी की सरस्वती, प्रेमचंद की माधुरी’, ‘जागरणहंस, माखनलाल चतुर्वेदी की कर्मवीरतथा प्रतापऔर गणेश शंकर विद्यार्थीकी अभ्युदयएवं प्रतापप्रमुख पत्रिकाएँ हैं।

        राजा राममोहन राय ने सन् 1827 में अपने पत्रों के उद्देश्य को स्पष्ट करते हुए लिखा कि- ‘‘मेरा सिर्फ यही उद्देश्य है कि मैं जनता के सामने ऐसे बौद्धिक निबन्ध प्रस्तुत करूँ जो उनके अनुभवों को बढ़ाए और सामाजिक प्रगति में सहायक सिद्ध हो। मैं अपने शक्तिशाली शासकों को उनकी प्रजा की परिस्थितियों का सही परिचय देना चाहता हूँ ताकि शासन जनता को अधिक से अधिक सुविधा देने का अवसर पा सके और जनता उन उपायों से परिचित हो सके जिनके द्वारा शासकों से सुरक्षा पायी जा सके।’’ कहना न होगा कि राजा राममोहन राय की उक्त टिप्पणी आज भी उतनी ही प्रासंगिक है जितनी लिखते समय रही होगी। बाद में हिन्दी पत्रिकाओं के स्वर अवश्य बदले जब उन्हें अंग्रेजों की अनीति, अत्याचार और शोषण के विरुद्ध लिखना पड़ा। इस क्रम में हिकी का उल्लेख करना समीचीन है जिसने अंग्रेज वायसराय के अत्याचारों व अनाचारों का विरोध करने के लिए अखबार निकाला और परिणामस्वरूप उसे पहले कारावासित किया गया फिर उसे निर्वासन की सजा सुनायी गयी। अब तक हिन्दी समाचार पत्र व पत्रिकाओं का यह उद्देश्य गति पकड़ चुका था कि हमें सच्चाई को सामने लाकर अंग्रेजों के अत्याचारपूर्ण शासन का विरोघ करना है।

       स्वातंत्र्योत्तर भारत में पत्र एवं पत्रिकाओं ने विषयान्तर किया जिसका बहुत कुछ श्रेय सच्चिदानन्द हीरानन्द वात्सायन अज्ञेयको जाता है। इन्होंने प्रतीक’, ‘नया प्रतीकओर दिनमानजैसे उच्च स्तरीय प़त्र निकाले। वे शब्दके प्रति प्रारम्भ से ही सचेत थे इसीलिए प्रतीकमें काव्य-भाषा और साहित्यिक-भाषा पर संपादकीय, लेख व परिचर्चा प्रकाशित होती थी। दिनमानके माध्यम से उन्होंने राजनैतिक समीक्षा और समाचार विवेचन की शैली हिन्दी में विकसित की। उन्होंने नव भारत टाइम्स’ (हिन्दी) के साहित्यिक और सांस्कृतिक परिशिष्ट को नई उचाईयाँ प्रदान की।

      धर्मवीर भारती ने धर्मयुगपत्रिका में सर्वसमावेषी कल्पना को साकार किया। फलस्वरूप इसमें राजनैतिक, सांस्कृतिक एवं साहित्यिक सामग्री के साथ ही साथ खेल, महिला-जगत, बाल-जगत जैसे स्तम्भों का भी समावेश किया। भारती ने हिन्दी रंगमंच और लोक कथाओं का भी समादर किया। हिन्दी की नवीन विधाओं जैसे संस्मरण, रेखा-चित्र, डायरी, रिपोर्ताज और यात्रा-वृतान्त को भी अपनी पत्रिका में बराबर का स्थान दिया। इससे न केवल हिन्दी का बहुमुखी विकास हुआ अपितु समाज भी लाभन्वित हुआ। इसी प्रकार कादम्बिनी’, ‘साप्ताहिक हिन्दुस्तानतथा हंसपत्रिकाओं ने भी स्तरीय रचनाएँ उपलब्ध कराकर समाज का भला किया। सरितामुक्तासामान्य हिन्दी पाठी पत्रिकाएँ मानी गईं। कभी सच्ची कहानियाँपाठक का भी एक वर्ग हुआ करता था। समाचार पत्र भी आते-जाते रहे। नवजीवनजैसा समाचार-पत्र अब इतिहास बन चुका है। अमृत प्रभातलोगों की स्मृति में है। वर्तमान में हिन्दी भास्कर, दैनिक जागरण, आज, नवभारत टाईम्स, सहारा आदि हिन्दी की सेवा में लगे हुए हैं।

     पत्र-पत्रिकाएँ समाज पर अपना प्रभाव अवश्य छोड़ती हैं। इस अकाट्य सत्य को झुठलाया नहीं जा सकता। महाकवि वोल्टायर और रूसो की जो भूमिका फ्रांस की क्रान्ति में थी उसका प्रामाणिक दस्तावेज उस क्रान्ति का इतिहास है। भारत में भी सत्तावनी क्रांति के अनेक पत्र प्रतिबंधित हुए और प्रकाशकों पर देश-द्रोह का मुकदमा चला। मैथिलीशरण गुप्त की भारत-भारतीतथा प्रेमचंद के सोज़े वतनकी प्रतियाँ जब्त हुईं और पुस्तकों पर बैन लगा। साहित्य का यही दुर्दमनीय प्रभाव है जो दिखता नहीं पर मनुष्य की धमनियों में प्रवाहित रक्त पर सीधा असर करता है। यदि साहित्य की आप्यायिनी शक्ति इतनी प्रबल है तो हमारा भी कर्तव्य बनता है कि हम साहित्य को समर्थ बनाएँ।

पत्र व पत्रिकाओं की सबसे बड़ी समस्या यह है कि यहाँ अभिव्यक्ति-स्वात़ंत्र्य नहीं है। यह अधिकार देशवासियों को संविधान प्रदत्त तो है परन्तु हकीकत क्या है। पत्रकार या रचनाकर को अपने पत्र के प्रकाशक व संपादक के पद चिन्हों पर चलना पड़ता है। शासन की नजरे इनायत न हो जाए, वरना कुछ भी हो सकता है। पर यहाँ यह स्वातंत्र्य नेताओं को मयस्सर है वे कुछ भी कहकर पाक-साफ रह सकते हैं। हम अभी इन्दिरा गाँधी प्रवर्तित आपातकाल को भूले नहीं हैं। उस समय पत्रकारों पर कितने बंधन थे। एक-दो पत्र जो सच्चाई बयाँ करने की जुर्रत कर रहे थे उनकी आर्थिक सहायता ही बन्द कर दी गयी। इस सत्य के प्रामाणिक दस्तावेज राजकीय अभिलेखागार में संरक्षित हैं। तात्पर्य यह कि मंसूर को तो फांसी मिलनी ही है, परिस्थिति चाहे जो हो। इसी वर्ष सन् 2014 में प्रकाशित कवि बृजेश नीरज के कविता-संग्रह कोहरा सूरज धूपकी शब्दशीर्षक कविता में रचनाकार के इस दर्द को बखूबी उकेरा गया है। यथा-

लेकिन शब्द हैं कि बोलते नहीं

उन्हें इंतजार है कवि का

उठाए कलम लिख दे उन्हें

फटे कागज के टुकड़े पर

पर वह कवि मजबूर है

काट दिए गए हैं उसके हाथ

शाहजहाँ द्वारा

        पत्र-पत्रिकाओं के पथ-च्युत होने का केवल यही कारण नहीं है कि अभिव्यक्ति की पूर्ण स्वतंत्रता महज कागजी है। इसका एक कारण प्रकाशन पर पूँजीवादी नियंत्रण भी है। अब पत्रकारिता सेवा या मिशन नहीं, वह अब व्यवसाय या प्रोफेशन है। खबरों पर बाजारवाद हावी है। अब स्थिति यह है कि समाचार भले छूट जाए पर विज्ञापन का प्रकाशन नहीं छूटना चाहिए। विज्ञापन आय का मुख्य स्रोत बन चुका है। पत्र-पत्रिकाओं का जो प्रभाव कम हुआ है उसके पीछे व्यवसायिकता ही मुख्य कारण है। सेवा और टकसाल का रास्ता एक ही ओर नहीं जा सकता।

      इसमें सन्देह नहीं कि हिन्दी की पत्र-पत्रिकाओं की संख्या और उनकी गुणवत्ता में बड़ा परिवर्तन आया है। आज उनकी साज-सज्जा पहले से कई गुनी अच्छी है। परन्तु यथार्थ और कटु यथार्थ के नाम पर आज जो अश्लीलता साहित्य में आयी है, वह हमें स्तब्ध करती है। सामाजिक विकृति, कुत्सा, बलात्कार, हत्या और सेक्स का बड़ा ही वीभत्स और जुगुप्सित वर्णन आज के साहित्य में मिलता है जिसे अपरिपक्व पाठक चटकारे लेकर पढ़ता है। परन्तु साहित्य चटकारे लेकर पढ़ने वाली वस्तु नहीं है। यह भाव औेर रस में डुबो देना वाला सागर है। अक्सर हम फिल्मकारों के मुख से सुनते हैं कि जनता जो पसन्द करती है हम वही उन्हें परोसते हैं। परन्तु यह तो नैतिकता नहीं है। इसका नाम सामाजिक प्रतिबद्धता नहीं है। यदि हम समाज में हैं तो हमारा दायित्व है कि हम समाज को स्वच्छ रखें। बच्चा यदि किसी मीठे विष को पीने की जिद करे तो क्या उसे विष मुहैया करा देना चाहिए। अब तो प्रकाशित साहित्य में गालियों का प्रयोग धड़ल्ले से हो रहा है। पहले कला जीवन के लिए या कला, कला के लिए की बहस होती थी पर अब यह भी बहस होनी चाहिए कि क्या कला अश्लीलता के लिए भी है। यदि समाज का कोई वर्ग ऐसे साहित्य का सृजन कर रहा है अथवा ऐसे साहित्य का प़क्षधर है तो भी इसको प्रोत्साहन नहीं मिलना चाहिए चाहे भले ही समाज में वह यथार्थ रूप से घटित हो रहा हो। आज से वर्षों पूर्व एक ललकार मैथिलीशरण गुप्त ने भरी थी -

हो  रहा  जो  हो रहा  सो हो रहा

यदि वही हमने किया तो क्या किया

किन्तु करना चाहिए कब क्या कहाँ?

व्यक्त करती है कला ही वह यहाँ।

 

        साहित्य सृजन भी एक कला है। कला में सौन्दर्य-बोध होता है। साहित्य में सौन्दर्य अपेक्षित है। अश्लीलता नहीं। परन्तु दुर्भाग्य से आज की पत्र-पत्रिकाएँ भदेष होती जा रही हैं। हमें साहित्य की रचना करने से पूर्व समाज की ओर देखना है उसके भले के बारे में सोचना है। तुलसीदास  ने मानस में रचना-धर्म को बड़े स्पष्ट और कलात्मक ढंग से समझाया है-

कीरति भनिति भूति भलि सोई।

सुरसरि सम सब कर हित होई।

 

     मलिक मुहम्म्द जायसी ने पद्यावतमें एक स्थान पर कहा है- कवि के बोल खरग हिरवानी।पर यह उस समय की बात थी, जब कलम की ताकत से बड़ी-बड़ी सियासतें काँपती थीं। गणेश शंकर विद्यार्थी, बाबूराव पराड़कर, बी जी हार्निमन, ब्रेलवो, सैय्यद अब्दुल्ल्ला और एस सदानन्द जैसे पत्रकार ओैर अज्ञेय तथा भारती जैसे कलमकार अब कहाँ हैं। आज की पत्रकारिता की एक उद्भावना पेज थ्रीका प्रादुर्भाव है। इसमें समाज के तथाकथित अभिजात्य वर्ग की रंगीनियों के किस्से छपते हैं। यह पीत-पत्रकारिता का युग है। आज का समाज भी शायद सनसनी ही पसन्द करता है। परन्तु पत्रकार व साहित्यकार को जगना होगा। हमें सृजन को कला मानकर उसे गढ़ना होगा। रचनाओं को संस्कार देना होगा। पत्र-पत्रिकाओं से अलग जो स्वतंत्र लेखन व प्रकाशन हो रहा है उसमें अभी भी नैतिक मूल्यों को संजोया जा रहा है, उसका कारण केवल यह है कि यह रचनाएँ व्यवसायिक नहीं है। इन पर किसी पत्र की अपनी नीति हावी नहीं है। इन पर संपादक का अंकुश नहीं है और अभिव्यक्ति स्वातंत्र्य के नाम पर कुछ भी लिखकर सस्ते पाठकों को रिझाना इनका उद्देश्य नहीं है। उदाहरणस्वरूप अभी हाल में ही मुझे दो काव्य-संकलन पढ़ने को मिले। एक बृजेश नीरज का कोहरा सूरज धूपऔर दूसरा कुंती मुकर्जी कृत बंजारन। इन्हें पढ़कर दिल को सुकून मिलता है। कवि का आदर्श अभी जीवित है। कविता के प्राण अभी बचे हैं लेकिन अभी बहुत कुछ करना बाकी है। मुझे विनय सिंह की कविता याद आती है जो रचना-धर्म को बड़े सलीके से रूपायित करती है। आप भी मुलाहिजा फरमाएँ -

तुमने  कलम  उठायी  है तो  वर्तमान लिखना

हो  सके  तो  राष्ट्र  का  कीर्तिमान  लिखना।

चापलूस  तो  लिख  चुके हैं चालीसा  बहुत

हो  सके तो  तुम हृदय का तापमान लिखना।

महलों में गिरती है गरिमा जो गाँव की

सहमी सी सड़कों पर तुम स्वाभिमान लिखना।

और अब मैं ज्यादा क्या कहूँ आपसे

अपनी सभ्यता और संस्कृति को प्रणाम लिखना।

 

ई एस-1/436ए सीतापुर रोड योजना कालोनी

अलीगंज सेक्टर-ए, लखनऊ

मो0 9795518586