Monday, 2 February 2026

आवाज़ जो सीमाएँ नहीं मानतीं

 विश्व रेडियो दिवस और जनसंचार की जीवन्त विरासत

- डॉ. शैलेश शुक्ला

वैश्विक समूह संपादक

सृजन संसार अंतरराष्ट्रीय पत्रिका समूह

विश्व रेडियो दिवस हर वर्ष 13 फ़रवरी को मनाया जाता है, पर यह केवल एक औपचारिक तिथि नहीं है, बल्कि उस माध्यम के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का अवसर है जिसने बीसवीं सदी से लेकर इक्कीसवीं सदी के डिजिटल युग तक मनुष्य को मनुष्य से जोड़ने का काम किया है। रेडियो की सबसे बड़ी शक्ति उसकी सरलता और सर्वसुलभता रही है। जब दुनिया के अनेक हिस्सों में साक्षरता दर कम थी, जब टेलीविजन और इंटरनेट की कल्पना भी नहीं की जा सकती थी, तब रेडियो ने समाचार, ज्ञान, संगीत और संवाद को जन-जन तक पहुँचाया। यही कारण है कि आज भी, तमाम आधुनिक तकनीकों के बावजूद, रेडियो अपनी प्रासंगिकता बनाए हुए है और विश्व स्तर पर सबसे भरोसेमंद संचार माध्यमों में गिना जाता है।

विश्व रेडियो दिवस मनाने की पृष्ठभूमि ऐतिहासिक और प्रतीकात्मक दोनों है। 13 फ़रवरी 1946 को संयुक्त राष्ट्र रेडियो की शुरुआत हुई थी, जिसका उद्देश्य युद्ध के बाद की दुनिया में शांति, सहयोग और वैश्विक समझ को बढ़ावा देना था। इसी ऐतिहासिक महत्व को देखते हुए यूनेस्को ने वर्ष 2011 में इस तिथि को विश्व रेडियो दिवस के रूप में घोषित किया और 2012 में संयुक्त राष्ट्र महासभा ने इसे आधिकारिक मान्यता दी। यह निर्णय केवल अतीत को सम्मान देने के लिए नहीं था, बल्कि भविष्य में भी रेडियो की भूमिका को रेखांकित करने के लिए था, क्योंकि यह माध्यम आज भी दुनिया के करोड़ों लोगों तक बिना किसी भेदभाव के पहुँचता है।

रेडियो की वैश्विक पहुँच को समझने के लिए आँकड़ों पर दृष्टि डालना आवश्यक है। अंतरराष्ट्रीय रेडियो संगठनों और मीडिया अनुसंधानों के अनुसार, दुनिया की लगभग 90 प्रतिशत आबादी किसी न किसी रूप में रेडियो सिग्नल की पहुँच में है। यह तथ्य अपने आप में महत्वपूर्ण है, क्योंकि इंटरनेट या स्मार्टफोन की पहुँच अभी भी समान रूप से सभी देशों और वर्गों में नहीं है। अनेक विकासशील देशों और दूरस्थ क्षेत्रों में रेडियो आज भी सूचना का प्राथमिक स्रोत है। विश्वसनीयता के संदर्भ में भी रेडियो अन्य माध्यमों से आगे माना जाता है। कई वैश्विक सर्वेक्षण यह दर्शाते हैं कि समाचार और आपातकालीन सूचनाओं के लिए लोग रेडियो पर अधिक भरोसा करते हैं, क्योंकि यह त्वरित, अपेक्षाकृत निष्पक्ष और बाधारहित माध्यम है।

रेडियो का सामाजिक महत्व केवल सूचना प्रसारण तक सीमित नहीं है। यह माध्यम समाज की आवाज़ को अभिव्यक्त करने का मंच भी प्रदान करता है। सामुदायिक रेडियो इसका सबसे सशक्त उदाहरण है, जहाँ स्थानीय लोग अपनी भाषा, अपनी समस्याएँ और अपने समाधान स्वयं प्रस्तुत करते हैं। स्वास्थ्य जागरूकता, कृषि परामर्श, महिला सशक्तिकरण और शिक्षा जैसे विषयों पर रेडियो कार्यक्रमों ने जमीनी स्तर पर सकारात्मक बदलाव लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। अनेक देशों में यह देखा गया है कि रेडियो कार्यक्रमों के माध्यम से टीकाकरण, स्वच्छता और आपदा-पूर्व तैयारी जैसे विषयों पर लोगों की समझ और सहभागिता में वृद्धि हुई है।

आपदा के समय रेडियो की भूमिका विशेष रूप से उल्लेखनीय रही है। भूकंप, बाढ़, चक्रवात या युद्ध जैसी स्थितियों में जब बिजली, मोबाइल नेटवर्क और इंटरनेट बाधित हो जाते हैं, तब बैटरी से चलने वाला रेडियो ही वह माध्यम बनता है जो लोगों तक जीवनरक्षक सूचनाएँ पहुँचाता है। अंतरराष्ट्रीय अनुभव यह दर्शाता है कि समय पर प्रसारित चेतावनियाँ और निर्देश हजारों जानें बचाने में सहायक रहे हैं। इसी कारण अनेक देशों की आपदा प्रबंधन नीतियों में रेडियो को एक अनिवार्य संचार उपकरण के रूप में शामिल किया गया है।

भारत में रेडियो का इतिहास भी सामाजिक और राष्ट्रीय चेतना से गहराई से जुड़ा हुआ है। बीसवीं सदी के प्रारंभ में आरंभ हुए रेडियो प्रसारण ने स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान भी अपनी भूमिका निभाई। स्वतंत्रता के बाद आकाशवाणी ने राष्ट्र निर्माण के कार्य में शिक्षा, संस्कृति और वैज्ञानिक सोच को बढ़ावा दिया। आज आकाशवाणी देश के सबसे व्यापक मीडिया नेटवर्कों में से एक है, जिसके सैकड़ों केंद्र और हजारों घंटे के कार्यक्रम देश की विविध भाषाओं और बोलियों में प्रसारित होते हैं। इसके साथ-साथ एफएम रेडियो और सामुदायिक रेडियो ने शहरी और ग्रामीण दोनों क्षेत्रों में नए श्रोताओं को जोड़ा है। भारत में सामुदायिक रेडियो स्टेशनों की संख्या लगातार बढ़ी है, जो यह दर्शाता है कि लोग स्थानीय और प्रासंगिक सामग्री को महत्व देते हैं।

डिजिटल युग में रेडियो ने स्वयं को नए रूप में ढाला है। इंटरनेट रेडियो, मोबाइल एप्स और पॉडकास्ट के माध्यम से रेडियो अब समय और स्थान की सीमाओं से परे पहुँच गया है। युवा वर्ग, जो पारंपरिक रेडियो से कुछ हद तक दूर हो रहा था, वह अब ऑन-डिमांड ऑडियो सामग्री के माध्यम से फिर जुड़ रहा है। यह परिवर्तन यह साबित करता है कि रेडियो केवल तकनीक नहीं, बल्कि एक विचार है- आवाज़ के माध्यम से संवाद का विचार। यही कारण है कि बड़े मीडिया समूहों से लेकर स्वतंत्र रचनाकारों तक, सभी रेडियो और ऑडियो प्लेटफॉर्म की ओर आकर्षित हो रहे हैं।

विश्व रेडियो दिवस का एक महत्वपूर्ण उद्देश्य अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और मीडिया की विविधता को बढ़ावा देना भी है। रेडियो अपेक्षाकृत कम लागत वाला माध्यम है, इसलिए छोटे समुदायों और अल्पसंख्यक समूहों को भी अपनी बात रखने का अवसर देता है। यह लोकतांत्रिक मूल्यों को मजबूत करता है और संवाद की संस्कृति को प्रोत्साहित करता।

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