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Tuesday, 23 December 2025

जीवन से जूझते लोक का यथार्थ

 डॉ विद्याभूषण

 

नवें दशक के लोकप्रिय एवं महत्वपूर्ण कथाकार कैलाश बनवासी के तीन कहानी संग्रह लक्ष्य एवं अन्य कहानियाँ’, ‘बाजार में रामधन’, ‘पीले कागज की उजली इबारतसहित लौटना नहीं हैउपन्यास प्रकाशित हो चुका है। इन संग्रहों में अनेकों महत्वपूर्ण कहानियाँ मौजूद हैं जिन्होंने हिन्दी कथा साहित्य को समृद्ध किया है। इनका चौथा कहानी संग्रह प्रकोप एवं अन्य कहानियाँकई मायनों में महत्वपूर्ण है। जहाँ समकालीन कहानी का केन्द्र मध्यवर्गीय जीवन बोध होता जा रहा है वहीं उन्होंने निम्नवर्गीय चरित्रों को अपनी कहानियों के केन्द्र में रखा है। इस संग्रह की संपूर्ण कहानियाँ आम कहानियों से हटकर हैं। इनकी यह खासियत है कि यह हमारे आस-पास के जीवन से ली गई हैं। जिन चीजों को हम देखते हैं, परखते हैं, महसूस करते हैं, जो हमारे जीवन के प्रतिदिन का जाना पहचाना हिस्सा है, कैलाश जीवन और समाज के उन्हीं संदर्भों का सूक्ष्म परीक्षण करते हैं और परीक्षण उपरांत ही अपनी कहानियों को गढ़ते हैं। पेशे से शिक्षक होने के कारण उनके जीवन का अधिकांश समय ग्रामीण क्षेत्र में गुजरा है इसलिए उन्हें अपनी जमीन से, आसपास के माहौल से, विभाग एवं विभागीय अमले से जीवन के खट्टे-मीठे अनुभव प्राप्त हुए हैं जो इनकी कहानियों में स्पष्ट रूप से दिखाई देते हैं। इनकी कहानियों में बेवजह की उठापटक दाँव-पेंच व प्रपंच नहीं है जिससे जीवन की गहन अनुभूति और वैचारिक प्रतिबद्धता स्वस्फूर्त ही अभिव्यंजित होती है। ये कहानियाँ समकालीन समाज में व्याप्त ज्वलंत समस्याओं सहित युगीन सच्चाईयों से भी पाठकों को रूबरू कराती हैं।

    संग्रह की पहली कहानी गाँव: कुछ दृश्यमें दर्शाया गया है कि जहाँ शहरों में चमचमाती अट्टालिकाएँ, दुकानें, मॉल्स, मल्टीप्लेक्स तेजी से निर्मित हो रहे हैं, जीवन शैली में हो रहे बदलाव, शहरों की चकाचौंध में फँसा व्यक्ति आधुनिकीकरण और बाजारू उत्पादों के गिरफ्त में फंसकर केवल अपने जीवित होने का एहसास कर पा रहा है, वहीं इन सबसे दूर ग्रामीण, श्रमिक, कामगार, युवा एवं वृद्ध स्त्रियाँ मौसमों की मार का निडरतापूर्वक मुकाबला कर अपने दैनिक जीवन के कार्यों का निपटारा करती हुई मेहनतकश कार्यों को भी पूरी तत्परता के साथ करती हैं। इनके बीच आपसी सहचर्य का एकमात्र माध्यम हँसी-ठिठोली ही होता है। वे सभी इसमें डूबकर आपस में एक-दूसरे के प्रति सहज अपनापन रखते हैं जैसे वे एक परिवार का हिस्सा हों। यह कहानी इन्हीं ग्रामीण कामगार स्त्रियों की विसंगतियों को व्यक्त करती है। साथ ही, इन स्थितियों के विरूद्ध संघर्ष करने की प्रेरणा देती है। यहाँ श्रम और संघर्ष का सौंदर्य देखते ही बनता है। यह कहानी सरल, सहज होने के बावजूद अपनी दृश्यात्मक अभिव्यक्ति के कारण पाठकों को प्रभावित करती हुई समूचे ग्रामीण परिवेश को अपनी रचनात्मकता से जीवंत कर देती है।

 

    अव्यक्त प्रेम की संजीदा अभिव्यक्ति है संग्रह की दूसरी कहानी प्रेम अप्रेम। नए-नए शिक्षक बने अल्हड़ युवा और भोली-भाली ग्रामीण युवती की मुलाकात बस यात्रा के दौरान होती है, जहाँ हुई बातचीत से वे एक-दूसरे के प्रति आकर्षित होते हैं। इस प्रेम की पुष्टि गाँव के मंडाई मेले में होती है, जहाँ युवती द्वारा युवा शिक्षक को तीन सफेद बिल्लियों का पोस्टर भेंट स्वरूप दिया जाता है। शिक्षक द्वारा पोस्टर को प्रेम-पत्र समझा जाता है। इसी जिज्ञास में कहानी बिना किसी प्रेमाकार लिए तब खत्म हो जाती है जब उस युवती को गाँव में आए अकाल की वजह से पलायन करना पड़ता है। कथाकार ने इस कहानी के माध्यम से छत्तीसगढ़ में पिछले कुछ वर्षों में महत्वपूर्ण समस्या बनकर उभरी पलायन की समस्या पर बड़ी गहराई से चिंता व्यक्त की है। साथ ही, युवा पीढ़ी के तमाम आधुनिक आचार-व्यवहार के बीच भी प्रेम के उद्दात्त मूल्यों को बचाने का भरसक प्रयास किया है।

 

    कहानी प्रकोपसंग्रह की प्रतिनिधि रचना है। यह कहानी भारतीय कृषक जीवन की तकलीफों, त्रासदियों, विद्रूपताओं, विडम्बनाओं के साथ ही उनके परिवार के साथ होने वाले समस्त अमानवीय व्यवहार के सच को भी उद्घाटित करती है। हमारा देश तकनीकी विकास के चरमोत्कर्ष पर है। फिर भी विडम्बना है कि भारतीय ग्राम अब भी अपना संपूर्ण विकास नहीं कर पाया है। इन ग्रामों में निवासरत कृषक रोग, शोक, विवाद, व कर्ज से ग्रसित हैं। तकनीकी रूप से सक्षम कृषकों को छोड़कर शेष पूर्ण रूप से मानसून पर ही निर्भर हैं। वनों की अंधाधुंध कटाई ने इस संकट को और अधिक गहरा दिया है। मानसून पर निर्भर कृषकों को कम व अधिक वर्षा के साथ ही बिजली, खाद, बीज, कीटनाशक सहित प्राकृतिक प्रकोपों जैसी समस्याओं से भी जूझना होता है। इन्हीं समस्याओं से जूझता प्रकोपकहानी का प्रमुख पात्र इतवारी जो कि भारतवर्ष के अन्य कृषकों की ही तरह है। ग्राम के ही दीनानाथ साहू से चार एकड़ जमीन फसल उगाने हेतु किराये पर लेता है समस्त परिवार द्वारा उस जमीन पर जी-तोड़ मेहनत कर फसल उगाता है। फसल उगने पर मानसून दगा दे जाता है और अकाल की स्थिति निर्मित हो जाती है। क्षेत्र में सरकार द्वारा पानी की कोई व्यवस्था नही की जाती क्षेत्रीय विधायक द्वारा पानी की व्यवस्था करने के संबंध में दिया गया आश्वासन केवल आश्वासन ही सिद्ध होता है। परेशान इतवारी द्वारा पत्नि के समस्त गहने गिरवी रख पानी की व्यवस्था की जाती है पानी पाकर फसलें लहलहा उठती है किन्तु फसल कटने से ठीक पहले भूरा माहो नामक बिमारी की चपेट में आ जाती है और कटने के लिए तैयार खड़ी फसल पूरी तरह तबाह हो जाती है। गले तक कर्ज में डूबा इतवारी इस घटना से विक्षिप्त सा हो जाता है और अंततः आत्महत्या कर लेता है।

 

    इस देश की सबसे बड़ी विड़म्बना है कि उसका अन्नदाता ही कर्ज में डूबकर आत्महत्या करने को विवश है। सरकारी तंत्रों की नसों में फैला भ्रष्टाचार का रक्त कैंसर पूरी तरह लाईलाज बीमारी का रूप धारण कर चुका है वह केवल आश्वासनों एवं झूठे वादों पर ही सीमित होकर रह गया है। शासन के पास न तो कृषकों के लिए कोई ठोस नीति है और न ही उन्हें होने वाले नुकसान की भरपाई के लिए कोई अच्छी योजना, यदि कुछ है भी तो उसमें इतने पेंच हैं कि सही समय पर उसका लाभ प्राप्त कर पाना कृषकों के लिए संभव नही हो पाता, बेचारा कृषक झूठे आश्वासनों पर विश्वास कर सर्वस्व लुटा अपने आपको ठगा सा महसूस करते हंै। वैसे भी ग्रामीण समाज में धार्मिक आस्था, अंधविश्वास, जातिगत व्यवस्था जैसे विषैले सर्प अपना फन फैलाये कृषकों को डसने को तैयार बैठे हैं ग्रामीण सामाजिक ढांचा पूरी तरह चरमरा गया है। कहानी प्रकोपइन्हीं सब भ्रष्ट व्यवस्थाओं की पोल खोलती है, इस कहानी का सबसे मार्मिक स्थल हैं इतवारी की लाश को पोस्टमार्डम उपरांत थाने से छुड़वाने हेतु उसके बेटे आजू को थानेदार मिश्रा के महत्वहीन व तकलीफ देह प्रश्नों के उत्तर देने पड़ते हैं मिश्रा जी का दूसरे दिन तीन सौ रूपये मिलने की प्रत्याशा में ही लाश ले जाने की बात कहना, आजू द्वारा अपना घर गिरवी रख तीन सौ रूपये का इंतजाम करना संवेदनशील पाठकों को गहरे से विचलित करता है।

 

भ्रष्टाचार की नाजायज औलादें थानेदार मिश्रा जैसे पात्र महान उपन्यासकार पे्रमचंद के उपन्यास गोदानकी उस घटना का स्मरण कराता है जब होरी की मृत्यु उपरांत गोदान की रस्म निभाने के दबाव में ब्राम्हणों को होरी की मृत्यु का कोई शोक नही होता बल्कि उन्हें दकियानूसी रीति रिवाजों के र्निवहन हेतु किये जा रहे गोदान का इंतजार होता है वैसे ही थानेदार मिश्रा का इतवारी की लाश ले जाने के लिए तीन सौ रूपये की माँग करना अमानवीयता का चरमोत्कर्ष है। कृषकों की ऐसी दुर्दशा और खेती के संकट के सच को उद्घाटित करती जनकवि धूमिल की ये पंक्तियाँ आज भी कालजयी प्रतीत होती हैं।

   

    इतनी हरियाली के बावजूद/अर्जुन को नही मालूम

    उसके गाल की हड्डी क्यों उभर आई/उसके बाल सफेद क्यों हो गये

    लोहे के दुकान में बैठा आदमी सोना/और इतने बड़े खेत में खड़ा आदमी मिट्टी क्यों हो गया है।

 

    भारतीय समाज के उच्छंृखल और अमानवीय विकास ने भ्रष्ट, अनैतिक, संवेदनहीन, अश्लील और अराजक युवा वर्ग को जन्म दिया है कहानियाँ शिविरएवं संतरेइन्ही अराजक, लम्पट व धूर्त युवाओं के समूह द्वारा किये जा रहे पल-पल के आचार-विचार व व्यवहारों को समग्रता के साथ व्यक्त करती है। यह वर्ग ग्रामीण जनों को अत्यंत हेय दृष्टि से देखता है इनकी नजरों में ग्रामीणों की कोई इज्जत व आत्मसम्मान नहीं हैं यह वर्ग हमेशा उनके आत्मसम्मान को ठेस पहुँचाने हेतु प्रयासरत होता है। अपनी झूठी आन, बान, शान के मद में चूर इन युवाओं का ना तो कोई अतीत है और ना ही कोई भविष्य ? इन लम्पट युवाओं का सामना जब अपने आत्मसम्मान के प्रति सचेत और सतर्क ग्रामीणों से होता है तो उनका प्रतिरोध एक चुनौती के रूप में उभरता है।

 

    कहानी शिविरडाॅ. वर्मा के नेतृत्व में लगे एन.एस.एस. यानी राष्ट्रीय सेवा योजना के गाँव मे लगे शिविर की है, जिसमें आये कालेज के युवा छात्रों द्वारा ग्रामीण स्त्रियों और युवतियों पर अश्लील इशारे करना और छेड़खानी करने से शुरू होती है और छात्र सुरेश द्वारा कथा पात्र बसंत की छोटी बहन पर किये गये बलात्कार की नाकाम कोशिश पर खत्म होती है बात घर तक पहुँचने पर बसंत के काका एवं ग्रामीण द्वारा आरोपी छात्र सुरेश और उसके साथियों की जमकर पिटाई की जाती है।   बदले की भावना से ग्रसित सुरेश और उसके साथियों द्वारा ग्रामीणों को देख लेने की बात कहता है। इस घटना का ज्ञान जब बसंत को होता है तो उसे सुरेश द्वारा अपनी पिटाई की आशंका घेर लेती है उसकी आँखों के सामने वह दृश्य उभरने लगता है जब बिना किसी बात के सुरेश द्वारा एक गरीब छात्र को बुरी तरह पीटा गया था। सुरेश से छात्र तो छात्र प्रोफेसर तक भयभीत होते हैं। आंतरिक अंर्तद्वंद्वं में फँसा बसंत है कभी गाँव से शहर कालेज आने-जाने की युक्तियाँ सोचता तो कभी अपनी छोटी बहन को कोसता नशे में गाँव वालों की ओर से सुरेश से माफी माँगने शिविर की ओर चल पड़ता है।

 

    कहानी संतरेरेलगाड़ी के डिब्बे में संतरे बेचने वाली महिलाओं के साथ द्विअर्थी संवादों में वार्तालाप कर मजे लेना उन पर अश्लील फब्तियाँ कसना, अश्लील इशारे करना और मौका मिलने पर उन महिलाओं को छूने की चेष्टा कर रहें नीचे की बर्थ में बैठे दो युवा जिनके उपर की बर्थ में बैठे लेखक कवि कृपाशंकर चकोर को ये सब चीजें नागवार गुजरती है भीतर ही भीतर उनके मन में आक्रोश उत्पन्न होता है सारे डिब्ब में लगभग इसी प्रकार के हालात होते हैं, चाहकर भी कोई इन सबका विरोध नही कर पाता, कुछ देर बाद जब युवकों द्वारा एक संतरेवाली महिला को छूने की चेष्टा की जाती है तो महिला द्वारा इन युवाओं का प्रतिरोध किया जाता है सारा माजरा समझ कृपाशंकर चकोर अपने भीतर उमड़ रही प्रतिरोध की अग्नि उस संतरे वाली महिला के भीतर पाकर अत्यंत प्रसन्न होते हैं। सरल व शांत स्वभाव की संतरेवाली महिला की अप्रत्याशित आक्रामकता और प्रतिरोध के आगे धूर्त, लम्पट, अराजक आधुनिक युवाओं का जोश ठंडा हो जाता है उनके होश ठिकाने आ जाते हैं संतरेवाली महिला के प्रतिरोध उपरांत रेलगाड़ी के डिब्बे में डरे सहमें आतंकित लोगों की हलचल और सक्रियता वापस लौट आती है। धूर्त, अराजक युवकों के समूह का आतंक खत्म हो जाता है। कृपाशंकर चकोर उसी संतरेवाली महिला से संतरा खरीद आस्वादन करते हुए मन ही मन एक आधुनिक बर्बर हमले के प्रतिरोध में अपनी विजयघोष का एहसास करते हैं।

 

    कहानी गोमती एक नदी का नाम हैवर्तमान आर्थिक समय में समाज के भीतर बचे जीवन मूल्यों को टटोलती है। कहानी ग्रामीण मजदूरन स्त्री गोमती जिसका पति चोरी के इल्जाम में जेल में बंद है जिसका जुर्म है धान कोचिया का पाँच बोरा धान अपनी मजदूरी के एवज में बिना पूछे बेचना। तीन बच्चों की माँ गोमती को परिवार के पालन-पोषण हेतु बाड़ी में काम करना पड़ता है काम पर बने रहने के लिए मजबूरीवश अपने बाड़ी मालिक द्वारा किये जा रहे छोटे-मोटे शोषण को सहना पड़ता है आर्थिक अभाव से ग्रसित गोमती अंततः अपनी देह तक सौंपने को तैयार हो जाती है। आधुनिक समय में व्यक्ति के मन में जरूरतमंद व समर्पित स्त्री के प्रति प्रेम और संवेदना का कोई स्थान नही होता वह हर हाल में ऐसी स्त्री को पाने की चेष्टा करता है। किन्तु यह कहानी अंत में अपने मर्म को प्रकट करती है जब बाड़ी मालिक द्वारा गोमती की देह को पाने की तीव्र इच्छा रखने पर भी कमरे में अकेले मिलने पर गोमती द्वारा बच्चे का जिक्र करने पर उसे अपने बिस्तर से भगा देता है साथ ही दुबारा काम पर आने से भी मना कर देना जैसा अविश्वसनीय कृत्य लेखक द्वारा कहीं न कहीं मानवीय मूल्यों को बचा लेने का सार्थक प्रयास है।

 

    ग्रामीण व्यक्ति हर तरह से सरल, सहज और भोला-भाला होता है इन ग्रामीण जनों के साथ कोई भी शहर का जालसाज व्यक्ति आसानी से छल कर सकता है यही होता है। कहानी काका के जीवन की एक घटनामें ग्रामीण वृद्ध स्त्री काकी जो कि अपने सिर पर दूध, दही, घी, मही, बेचकर अपने परिवार का पालन-पोषण करती है दुकान में हुई बहस पर गुस्से में आकर दुकान में बैठे युवक द्वारा काकी का सिर फोड़ दिया जाता है युवक के पिता द्वारा काकी को अस्पताल में भर्ती कराया जाता है पुलिस में रिर्पोट दर्ज न करने के एवज में वह अस्पताल में हो रहे खर्च उठाने को तैयार हो जाता है साथ ही उसके द्वारा चार सौ रूपये भी जमा कराया जाता है, किन्तु वृद्ध ग्रामीण काकी और काका अपने आप को उस समय ठगा सा महसूस करते हैं जब निर्धारित तिथि पर वह दुकानदार अस्पताल का आगामी खर्चा देने नहीं आता इस खर्च को वहन करने में काकी के गहने तक गिरवी रखने पड़ते हैं। यह कहानी आधुनिक समाज में खत्म हो रहे मानवीय मूल्यों को बड़ी मार्मिकता से रेखांकित करती हुई, शहरों में रहने वाले धूर्त, चालाक और मौकापरस्त लोगों की गहरी पड़ताल करती है साथ ही ऐसे लोगों से हमेशा सतर्क व सचेत रहने की प्रेरणा भी देती है।

    छटवें वेतनमान के समय में दो कौड़ी का आदमीइस संग्रह की सबसे मार्मिक कहानी है। यह एक अपंग किन्तु कर्मठ, जुझारू, ईमानदार, मानसेवी (भृत्य) संतोष के जीवन का हौलनाक बयान है। आर्थिक तंगी, शारीरिक अपंगता, नैतिक बोध, और स्वभावगत ईमानदारी इस मूल्यहीन समाज में उसकी स्थिति को और अधिक दयनीय व दारूण बना देती है। स्कूल के प्राचार्य व नियमित शिक्षकों द्वारा नित नये हथकंडे अपनाकर उस पर दबाव बनाया जाता है कि वह दिन में कार्य करने के अलावा रात में स्कूल की चैंकीदारी भी करें, संतोष द्वारा वेतन बढ़ाने की मांग और नियमित शिक्षकों का प्रतिरोध करने पर अनावश्यक दोषारोपण कर उसका मासिक मानदेय तक काट दिया जाता है इस घटना से आहत होकर संतोष मानसेवी (भृत्य) की नौकरी छोड़कर जीवन जगत में व्याप्त तमाम अनैतिक कार्यों में लग जाता है। यह कहानी अंत में एहसास करा ही देती है कि जिसके पास पद, पैसा, रूतबा नही है वह इस आधुनिक समय में हर जगह मिसफीट होता है, साथ ही अपने आपको देश के सिरमौर व समाज निर्माता समझने वाले निकम्मे, निठल्ले, चापलूस शिक्षकों के गैर शिक्षकीय घृणित व अनैतिक कृत्यों सहित उनके द्वारा किये जाने वाले शोषणों के सच को भी उद्घाटित करती है।

 

    पुरूष प्रधान समाज में पुत्री को जन्म देना एक अभिशाप से कम नहीं है। ज्ञात होने पर उसकी गर्भ में ही हत्या तक के प्रयास होने लगते हैं ऐसा ही कुछ कहानी उसके दरबार मेंकी नायिका डाॅली के साथ घटित होता है। शादी उपरांत पहली पुत्री होने पर पति व सास द्वारा उसे व मायके वालों को तरह-तरह के हथकंडे अपनाकर अपमानित व प्रताड़ित किया जाता है। इसका अंत तब होता है जब उसके ससुराल वाले ग्रामीण साधवी माताजी के दरबार में पहुँचते है जहाँ अपने आपको साधवी मानने वाली माताजी डाॅली के भाई पर मोहित हो उसके सामने अपने साथ रात गुजारने का प्रस्ताव रखती है स्वीकृति उपरांत एवज में माताजी द्वारा डाॅली के ससुराल वालों से कहा जाता है की वह घर की लक्ष्मी है उसे प्रताड़ित करने पर उनके घर की सुख-समृद्धि, ऐश्वर्य नष्ट होने का भय है उसे सुखी रखने पर ही घर में सुख, शांति रहेगी।

 

    यह कहानी वैज्ञानिक युग में धर्म और आस्था के नाम पर फैले अंधविश्वास के सहारे समाज में अपनी गहरी पैठ बना चुके बाबाओं और माताओं के कुटिल चरित्र को उजागर करती है। यह कहानी समाज के लिए नासूर बन चुकी इनकी धंधेबाजी, व्यक्ति को संतुष्ट करने हेतु रचे गए प्रपंच एवं उनके छद्म चालों की कलई तो खोलती ही है साथ ही पुत्र-पुत्री भेदभाव व कन्या-भ्रूण हत्या जैसी ज्वलंत समस्या को भी बड़ी संजीदगी से प्रस्तुत करती है। इस तरह कहा जा सकता है कि संपूर्ण मानव जाति के जीवन मूल्य जैसे नैतिकता, संवेदनशीलता, मानवीयता, संघर्ष व प्रतिरोध इस संग्रह की कहानियों में प्रमुखता से मौजूद हैं।

    कैलाश बनवासी की भाषा सरल, सहज, स्पष्ट होने के साथ-साथ पात्रानुकूल भी है जो इन कहानियों की सबसे बड़ी ताकत है। कहानियों में पात्र जिस प्रकार के होते हैं वे उनसे उसी प्रकार की भाषा का प्रयोग कराते हैं जिससे पाठकों के मन में पात्र एवं उसकी मानसिकता की स्पष्ट छवि उभरती है और वे जीवंत हो उठते हैं। कहानियों में छोटे-छोटे वाक्य एक-दूसरे से जुड़कर एक सधी हुई भाषिक संरचना का निर्माण करते हैं। बीच-बीच में मुहावरों, कहावतों एवं छत्तीसगढ़ी के शब्दों का प्रयोग भाषा में नई ताजगी का अनुभव कराते हैं। वे बहुप्रचलित भाषा के खिलंदड़ेपन से भी अपनी कहानियों को भरसक बचाते हैं।

    इस संग्रह की समस्त कहानियाँ सरल, सहज शिल्प में कही गई हैं, शिल्प और भाषा में किसी प्रकार की कृत्रिमता नहीं दिखाई देती है। कहानियों की विषय-वस्तु अप्रत्याशित फैलाव लिए नहीं वरन् बेहद लघु एवं वांछित कलेवर में सुसंगठित हैं। कहानी गाँव: कुछ दृश्यअलग फार्म में अवश्य है किन्तु कहानी सीधे-सपाट वर्णनात्मक शिल्प में होते हुए भी जिस तरह जीवन और प्राकृतिक दृश्यों को रचती है वह बेहद कलात्मक है।

 किसी भी समाज में लोक-जीवन का आधार गाँवों के लोग, उनके रीति-रिवाज, ईर्ष्या-द्वेष, मेल-मिलाप, उनका स्वभाव, गाँवों की संपूर्ण समस्याएँ, गाँव के अलग-अलग चरित्र, उनकी मानसिकता, खेत-खलिहान, बाग-बगीचे, पंचायत, चौपाल, राजनीति, हिंसा, गाँव के संस्कार, परम्पराएँ, नया ज्ञान, संचार माध्यम, शिक्षा, नगरों से संबंध के कारण उनमें आ रहे बदलाव आदि का समन्वय होता है। इस संग्रह की संपूर्ण कहानियों में लोक जीवन के समस्त सौंदर्य, उसकी विसंगतियों के साथ अभिव्यक्त हुए हैं। ये कहानियाँ लोक जीवन के सहज लोक पक्ष को रेखाँकित करती हुई उसके भीतर सक्रिय सामाजिक यथार्थ को भी परखती हैं। जहाँ लोक जीवन व संस्कृति को खत्म करने की साजिश चल रही है ये कहानियाँ उसके प्रतिरोध में उस लोक को बचाने की पुरजोर कोशिश करती हैं। अधिकांश कहानियाँ घटना प्रधान है, संपूर्ण घटनाएँ मोतियों की माला में गूँथी गई मोतियों की तरह ही एक दूसरे से अपने-आप जुड़ती जाती हैं।

    कैलाश बनवासी अपने समय, समाज एवं परिवेश के प्रति प्रतिबद्ध कथाकार हैं, जिसकी अभिव्यक्ति पूरी गंभीरता के साथ इनकी कहानियों में स्पष्ट रूप से परिलक्षित होता है। आधुनिकता के इस दौर में जब बहुत सारे लोग एक तरह से परास्त हो चुके हैं, हार की मानसिकता में हैं, ऐसे समय में इस संग्रह की कहानियाँ यह आश्वस्त करती हैं कि अभी भी कुछ है जो बचा है, सब कुछ खत्म नहीं हुआ है।

 

Tuesday, 9 December 2025

आँख भर आकाश

 आँख भर आकाशकाव्य संग्रह में आधुनिक जीवन की सबसे बड़ी समस्या को शामिल किया गया है वह समस्या है- ‘हाशिये के लोग

इस कविता संग्रह में संकलित कुछ कविताएँ देश के आधुनिक जन इतिहास का, स्वातन्त्रयोत्तर भारत का दहकता दस्तावेज हैं। मज़दूर वर्ग हमारे समाज का वह वर्ग है जिसकी ओर किसी का कोई ध्यान नहीं जाता। सब बस बड़े आदमी बनना चाहते हैं। कोई भी नीचे नहीं देखता कि गरीब मजदूर क्या चाहता है? वह भी तो आम आदमी की तरह रोटी, कपड़ा और मकान चाहता है। पर क्या उसे दो वक्त की रोटी नसीब हो पाती है? नहीं। क्यों? क्योंकि कोई उसकी ओर नहीं देखता। एक मजदूर सुबह से लेकर शाम तक मेहनत करता है फिर भी एक सुखी जिंदगी व्यतीत नहीं कर पाता क्योंकि हमारा समाज उसे नीची नजरों से देखता है।

हमारे देश के गरीब मजदूर के हालात से तो आप सभी वाकिफ ही होंगे। मजदूर की परिभाषा क्या है? दुःख, दरिद्रता, भूख, अभाव, कष्ट, मज़बूरी, शोषण और अथक परिश्रम- इन सबको मिला दें तो भारतीय मजदूर की तस्वीरें उभर कर आती हैं। भारतीय मजदूर दो वक़्त की रोटी और अपने परिवार का पालन पोषण करने के लिए कड़ी मेहनत करते हैं। उनकी तरफ कवि ने ध्यान खींचने का बख़ूबी प्रयास किया है जो एक समृद्ध समाज बना सके।

          बृजेश नीरज को ‘आँख भर आकाश’ कविता संग्रह के लिए शुभकामनाएँ!

-    विष्णु दुबे

Sunday, 17 January 2016

कोहरे से सूरज और धूप की तरफ अग्रसर कवि


डॉ अजीत प्रियदर्शी


भूमण्डलीकरण और बाजारवाद के बढ़ते दुष्प्रभावों से भरा यह समय मनुष्यमात्र के लिए गहरे, तनाव, दबाव, निराशा और खीझ से भरा है। कविता के लिए भी समय तनाव, दबाव, प्रतिरोध और असंतोष की अभिव्यक्ति के रूप में दिखाई दे रहा है। पक्षधर और प्रतिबद्ध कवि अपने समय तथा समाज के मनुष्यों की स्थिति, नियति से मुठभेड़ करते हैं फिर उन्हें बदलने के स्वप्न देखते हैं, आकांक्षा करते हैं और बदलाव के स्वप्न, आकांक्षा तथा संकल्प के साथ कविता करते हैं। कविता हमेशा जीवन के सच्चे अनुभवों से पैदा होती है। सच्चे अनुभवों के अभाव में कविता शब्दों का मधुर संसार मात्र रह जाएगी, जिसमें मार्मिकता और हृदयस्पर्शिता नहीं होगी। जीवन की खरी व सच्ची अनुभूतियों से लैश कविता में ही विश्वसनीयता और आत्मीयता का सहज संसार विद्यमान होगा।
बृजेश नीरज समकालीन कविता के पाठकों के बीच सुपरिचित नाम नहीं है। कोहरा सूरज धूपउनका पहला काव्य संग्रह है, जो अंजुमन प्रकाशन इलाहाबाद से छपा है। इस संग्रह में कुल साठ कविताएँ संकलित हैं। संग्रह की अधिकांश कविताएँ आकार-प्रकार में छोटी हैं लेकिन वे अनुभूति व अनुचिंतन से भरी कविताएँ हैं। इस संग्रह की अधिकांश कविताएँ यथार्थ को पूरी गम्भीरता से परखती हैं और सच को सच की तरह कहने का प्रयास करती हैं। उनकी कविताएँ मात्र अनुभूतियों, भावों की अभव्यक्ति नहीं हैं, बल्कि उनके विचारों और पक्षधरता का प्रकटीकरण भी है। कवि पाता है कि मनुष्य के लोभ का विकराल रूप अब प्रकृति का, नदी का ऐसा कृतघ्न दोहन करने लगा है कि नदी की धारा ठिठकी सीहै। धारा ठिठकी सी कविता में कवि रेखांकित करता है मैल से भरी, सहमी, सिकुडी धारा पर जब प्रातःकालीन सूर्य की किरणें पडती हैं तब- उजास नहीं फैलातीं/ खो जाती हैं/ स्याह लहरों में

बृजेश नीरज की छोटी कविताएँ अधिक भावप्रवण और विचार सघन हैं। ऐसी कविताओं में मुख्यतः अनुचिंतन या अनुभूति की प्रधानता होती है। छोटी कविताओं को पढ़कर कवि की भावना के साथ-साथ उनके विचार, पक्षधरता का स्पष्ट पता चलता है। विरोधकविता की ये पंक्तियाँ चित्रमयता, बिम्वमयता और अनुभूतिपरकता के साथ मार्मिक असर छोड़ती हैं- वातावरण में घुले नारे/ खण्डर में पैदा हुई अनुगूँज की तरह/ कम्पन पैदा करते हैं/ सर्द हवाएँ/ काँटों की तरह चुभती हैं/ अँधेरा गहराता जा रहा है मनुष्य विरोधी सत्ता के विरोधमें उठे नारे व्यक्ति के मनःमस्तिष्क में कम्पन पैदा करते हैं, ठीक उसी तरह जिस तरह सर्द हवाएँ काँटों की तरह चुभती हैं। कवि ने संकेत किया है कि अँधेरा गहराता जा रहा हैऔर ऐसे संकटपूर्ण समय में विरोधकी सार्थकता स्वंय सिद्ध है।

वर्तमान समय की सामाजिक-आर्थिक विषमता और उनसे पैदा हुई विसंगति, विद्रूपता और त्रासदी का चित्रण इस संग्रह की कविताओं में है। वर्तमान के कटु यथार्थ को, जीवन यथार्थ की विडम्बना को कवि ने कई बार मार्मिक व्यंग्य के सहारे उकेरा है। आजाद हैंकविता की कुछ पंक्तियाँ इसकी गवाह हैं- पेड़ की फुनगी पर टॅगे/ खजूर/ उसकी परछाई में/ खेलते बच्चे/ सूखे खेत/ कराहती नदी/ बढ़ता बंजर/ लोकतंत्र के गुम्बद के सामने/ खम्बे पर मुँह लटकाए बल्ब


कई बार तकलीफदेह जीवन दृश्यों को देखकर उनका संवेदनशील मन भावुक हो जाता है। असरदार चित्रों- बिम्बों के सहारे कवि ने वर्तमान समय के संकटों और संवेदनहीन सत्ता से उपजी त्रासदी को मार्मिक ढंग से बयान कर दिया है। जीवन संघर्ष की आँच में तपते-जूझते और भूख से छटपटाते, दलित बचपनको देखकर कवि की भावना उमड़ पड़ती है: पैसे के लिए हाथ फैलाते ही/ बिखर गया बाल पिण्ड/ सूखे होठों पर/ किसी उम्मीद की फुसफुसाहट/ आँखों में/ भूख की छटपटाहट/ व्यवस्था के पहियों तले/ दमित बचपन/ बेचैन था वयस्क हो जाने को। यहाँ कवि की कोरी भावुकता ही दर्ज नहीं हुई बल्कि दुखपूर्ण बाह्य जीवन पर उनकी संवेदननात्मक व मानसिक प्रतिक्रिया भी दर्ज हुई है। मई-जून की प्रचण्ड गर्मीं में जबकि लोग घरों में दुबके हैं, कवि देखता है कि- एक आदमी/ सिर पर ईंटें ढोता/ कहीं पिघला न दे उसे भी/ यह गर्मी/ लेकिन शायद/ उसकी आँतों का तापमान/ बाहर के तापमान से अधिक है यहाँ भावना, संवेदना और विचार की घुलावट है तथा निजी अनुभूति का ताप भी है। तभी तो वे अंतर्जगत में मौजूद तीन शब्दसे खुद को दहकता हुआ पाते हैं: आदमी, पेट, भूख/ जाने कब तक लदे रहेंगे/ मेरे कंधों पर

बृजेश नीरज असहज यथार्थ से बचते नहीं है बल्कि उससे मुठभेड़ करते हैं। उनकी कविता यथार्थ से मुठभेड़ की कविता है। वह देखते हैं कि अक्षर, शब्द और भाषा का मनमाना प्रयोग हो रहा है और उन्हें स्वार्थी मठाधीश अपने निजी स्वार्थ पूर्ति का साधन बना रहें हैं- अक्षर रंग बदल रहे हैं/ कथाएँ अर्थ/ नई परिभाषाएँ गढ़ी जा रही हैं/ नए मठ आकार ले रहें है। लेकिन कवि ने यहाँ इशारा तो किया है पर खुलासा नहीं किया है कि ऐसे लोग कौन हैं? उनकी शक्लें नहीं उभर पाई हैं यहाँ। उनकी कविता में यथार्थ की चीड़फाड़ कम है। कई बार यथार्थ का सरलीकरण की प्रवृत्ति कवि में दिखाई देती है। वह यथार्थ की भीतरी तहों को नहीं खोलता: कुछ है जो/ कहने से रह जाता है हर बार

शब्द और भाषा की ताकत और कमजोरी का गम्भीर एहसास कवि को है। वह पाता है कि- चीथडों से झाँकते/ शब्द बेचैन हैंकविता के वर्तमान संकट का अनुभव भी कवि निरंतर करता है। वह पाता है कि कविता कराह रही है/ गली के नुक्कड़ पर पड़ी/ तेज रफ्तार जिंदगी/ रौंदकर चली गई उसे। लेकिन जिंदगी में उम्मीद का दामन मजबूती से थामने वाला कवि, कविता के प्रति भी नाउम्मीद नहीं है। लेकिन अँधेरे को उजालाकहना सच्चाई से मुकर जाना है। यह बात वह जानता है इसीलिए वह सच्चाई बयान करना चाहता है, जिससे जीवन और कविता में दूरी न पैदा हो जाए। उसकी स्वीकोक्ति है: अब, मैं चाहता हूँ/ लिखूँ लालटेन/ लेकिन लिखने के लिए/ खुद लालटेन होना होगा/ पर मैं तो अँधेरे में हूँ/ पिघलता अँधेरा इस संग्रह में एक कविता है- उम्मीद। इस कविता की पंक्तियाँ हैं- हालांकि अँधेरे में हूँ/ लेकिन कुछ रोशनी आ रही है मुझ तक/ सुबह होने को है। ऐसी ही एक कविता है आस। जिंदगी के रास्ते में गहराते कोहरे के बीच चलना है। कवि यह तय कर चुका है क्योंकि जीवन संघर्ष में वह देख चुका है कि पत्तों के ढेर के नीचे/ चीटियाँ रास्ता ढूँढ रही हैं

बृजेश नीरज की कविता जीवन के जीवंत संघर्षों और कार्य-व्यापारों से संयुक्त है। उनकी कविता आसपास के जीवन और घर परिवारों से जुड़ी हुई है। उनकी कविता में आत्मपरकता के अंतर्गत वैयक्तिक अनुभूतियों का जीवन संसार मौजूद है। उसके दुख- शोक में विश्व-व्यथा का बीज मौजूद है। विश्व-व्यथा में कवि के निजी दुख-शोक की अनुभूतियों की छाप है। उनके यहाँ आत्मीयतापूर्ण पारिवारिक जीवन के स्नेह-माधुप और जीवन-संघर्ष के विविध रंग मौजूद हैं। वे कई कविताओं में पारिवारिक कर्तव्याभिमुख भावनाओं और दाम्पत्य प्रेम की भावनाओं की अभिव्यक्ति करते हैं। तुम्हारी आँखों में’, तुम्हारा स्पर्श, ‘विछोह(1,2) जैसी कविताओं में दाम्पत्य प्रेम और लगाव की अभिव्यक्ति हुई है। तुम्हारी आँखों में’, कविता की ये पंक्तियाँ सघन दाम्पत्य प्रेम की साक्षी हैं: तुम हमेशा ही/ एक उम्मीद थी/ मैं ही आँख मूँदे रहा/ अपने सपनों से/ जो हमेशा तैरते रहे/ तुम्हारी आँखों में

बृजेश नीरज भी कविता में गाँव और गाँव के लोगों, अम्मा, बचपन के मित्र तथा सुख-दुख की अर्धागिनी की आत्मीय और जीवंत उपस्थिति है। अपना गाँवकविता में वे स्मृतियों में जीवंत गाँव को याद करते हैं। वे याद करते हैं गाँव के बाग, नदी, हथपुइया रोटी पर नून-तेल से चुपड़कर खिलाने वाली बड़ी अम्मा और गुल्ली डण्डे के खेल को। मित्र के नामकविता में मित्र के लिए हमेशा तत्पर हृदय की मार्मिक अभिव्यक्ति है। बचपन के मित्र से बहुत दिनों बाद मिलने और उसके साथ होने वाले आत्मीय संवाद व आत्मीयता की संवेदनशील अभिव्यक्ति बहुत दिन बाद आएकविता में हुई है। आत्मीय बातचीत की शैली में गाँव-घर-खेत और गाँव के लोगों  के बारे में बताने वाली इस कविता की सहजतापुरअसर है। यह कविता पर्याप्त दिलचस्प और पठनीय है।

बृजेश नीरज की कविताओं में उनकी धार्मिक आस्था, भाग्यवाद और धार्मिक मिथकों-चरित्रों की अभिव्यक्ति हुई है। माँ शब्द दो कविता में वे कहते हैं जन्मा अजन्मा के भेद से परे एक सत्य माँ!“ ‘प्रातःकविता में प्रातःकाल के वर्णन में अक्षत, ‘कुमकुमजैसे शब्दों का इस्तेमाल एक धार्मिक वातावरण खड़ा करता है। धारा ठिठकी सीकविता में वे मैली गंगा से कहलाते हैं- हे भागीरथ’ ! तुम मुझे कहाँ ले आए?’ ‘उस पारकविता में वे अदृश्य रहस्थ के प्रति जिज्ञासा की अभिव्यक्ति करते हैं और मिथकीय पात्र गरूणभी अवतारणा करते हैं। मैं क्या हूँकविता में जगत और आत्म के प्रति अदृश्य, अज्ञात के प्रति जिज्ञासा भाव में उनकी आध्यात्मिक भावना का दर्शन होला है। वर्तमाल जीवन के संकट को मिथक व मिथकीय पात्रों और मिथकीय प्रतीकों द्वारा अभिव्यक्त करने की काव्य प्रवृत्ति राम तुम कहाँ होकविता में बखूबी देखी जा सकती है। जिंदगी कविता में भाग्यवाद की अभिव्यक्ति यों हुई है: जिंदगी हर बार/ दूर छिटक जाती है/ हर बार ढूँढता हूँ/ उसे फिर से/ हाथ की लकीरों में

बृजेश नीरज की कविता का गठन अनुभूति, संवेदना और विचारों के उचित सामंजस्य से मानसिक प्रक्रिया में होता हैं। उनकी कविता में उनकी सफगोई और संवेदनशील मन की अभिव्यक्ति हुई है। उनकी कविता में बिम्बों, मिथकों व प्रतीकों का इस्तेमाल हुआ है, कहीं सटीक और सृजनात्मक तो कहीं लापरवाहीपूर्वक। कविताओं में व्यतिरेक या तार्किक अन्विति का अभाव, अनुभूति की सरलता/ सपाटता/ और एकरेखीय, अनुभूतियों का सरलीकरण, धनीभूत भावना का बिखराव, निपट गद्यात्मकता, अतिभावुकता (सेंटिमेंटलिज्म), विवरणात्मकता आदि के कारण कविता और अभिव्यक्ति प्रभावहीन भी हुई है। इन कमियों के बावजूद उनकी कविता में बोलचाल की भाषा, दिलचस्प बयान, अनुभूति की सच्चाई, भाषिक ऐन्द्रिकता, आत्मीयता, सहजता और भाववेग वर्तमान समय के संकटों को लेकर चिंता और प्रतिबद्धता, विचारों की साफगोई आदि के कारण कई कविताएँ और कवितांश बड़े मार्मिक और प्रभावपूर्ण बन गए हैं। उनकी काव्य भाषा मध्यवर्ग के जीवन-व्यवहार की भाषा है। उनकी कविता एक तरह से संवाद कायम करती है, कभी स्वंय से कभी अन्यों से। कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि वे एक संभावनाशील कवि हैं, काव्यक्षमता से परिपूर्ण हैं। आशा है कि आने वाले समय में वे एक महत्वपूर्ण कवि के रूप में निखरकर सामने आएँगे।

-         असिस्टेंट प्रोफ़ेसर, हिन्दी विभाग, 
  डी.ए.वी. पी.जी. कॉलेज, लखनऊ

ई-मेल- priyadarshiajit7@gmail.com

Saturday, 16 January 2016

समीक्षा - लव कुमार लव के कविता संग्रह पर राहुल देव


अपनी मिट्टी से जुड़ी कविताएँ

कविता संग्रह- मिट्टी का साहित्य
कवि- लव कुमार लव
प्रकाशक- सतलुज प्रकाशन, हरियाणा
प्रकाशन वर्ष- 2015
पृष्ठ- 144
मूल्य- 250/-



कविता दुनिया की सबसे पवित्र और आदिम कला है| जब किसी भाषा का पहली बार आविष्कार हुआ होगा, तो जरूर कविता में ही यह जन्मी होगी| मनुष्य के लिए यह उतनी ही जरूरी रही होगी जितना हवा, पानी, भोजन और आवास| वर्तमान समय में बहुत से कवि अपने-अपने परिवेश में अपनी अभिव्यक्ति कविता में कर रहे हैं| लव कुमार लव भी उनमें से एक हैं| लव हरियाणा में हिंदी के अध्यापक हैं और साहित्य से गहरे तक जुड़े हुए हैं| मिट्टी का साहित्य उनका पहला कविता संग्रह है| इस संग्रह में उनकी कुल 68 कविताएँ संग्रहीत हैं|

प्रस्तुत संग्रह की कविताएँ पढ़ने से साफ़ होता है कि लव सामाजिक सरोकार से जुड़े रहने वाले एक संवेदनशील कवि बनने की प्रक्रिया में हैं| उनकी कविताओं के विषय समाज की विसंगतियों और यथार्थ के अंतर्विरोधों की उपज हैं| इस ओर से कवि की चिंताएँ इनकी कविता में व्यक्त हुई हैं| कवि अपनी काव्य-यात्रा के प्रारंभिक दौर में है| लव के पास अच्छी भाषा है, शैली है, शिल्प है बस उसे समकालीन साहित्य से जोड़कर देखने और रचना के स्तर पर और मांजने की आवश्यकता प्रतीत होती है| जब तक कवि कविता लिखने की पर्याप्त मानसिक तैयारी नहीं करता तब तक सच्ची कविता नहीं पैदा होती|

परछाई पहरेदार की नामक कविता में कवि की निम्न पंक्तियाँ देखें, “चल रहा हूँ उस युग की ओर/ बड़ी परछाई का बोझ लिए/ एक नयी सुबह की ओर/ लाठी बजाता, आवाज़ लगाता/ जागते रहो! जागते रहो!” या अपनी दलित शीर्षक कविता में कवि कहता है, “मैं ही आदि हूँ/ मैं ही अंत हूँ/ फिर भी समाज में/ अल्प पोषित क्यों हूँ/ इतना करने पर भी/ मैं ही शोषित क्यों हूँ ?”वह इन कविताओं में निरंतर प्रश्न उठाते हैं| कवि सार्वभौम मानवता का पक्षधर है| संग्रह की एक और महत्त्वपूर्ण कविता अपने कहन की वजह से अपना ध्यान आकर्षित करती है| शीर्षक है मजदूर चौक इस कविता में कवि एक मजदूर का चेहरा पढ़ने की कोशिश करता दिखता है| लव  लिखते हैं, “चेहरे पढ़ता हूँ कुछ क्षण रूककर/ कोशिश करता हूँ/ इनके अन्दर झाँकने की”|

लव को कविता की लय पर भी ध्यान देने की जरूरत है| कई कविताएँ इस कारण अपने पाठ में रूकावट जैसा आभास देती लगीं| वह कविता में स्मृति में जाते हैं फिर वर्तमान में वापस आते हैं लेकिन दोनों के मध्य कोई तार्किक रिश्ता प्रस्तुत नहीं कर पाते जिस कारण कविता एक नास्टैल्जिक विवरण बनकर रह जाती है| विषय को ज्यों का त्यों प्रस्तुत कर देने की अपेक्षा लव को उनमें बिम्ब लाकर अपनी कल्पना से जोड़ना चाहिए, यथार्थ की ज़मीन को छोड़े बगैर| इस ओर कवि को ध्यान देने की जरूरत है तभी उनकी कविता अपनी कोई स्वतंत्र पहचान बना पाने में सक्षम हो सकेगी| ऐसा नहीं है कि लव की कविता में बिम्ब नहीं हैं लेकिन वे उन बिम्बों को कोई उभार नहीं दे सके| कविता पढ़ने के बाद पाठक के मन में जो स्पेस बनना चाहिए वह नहीं बन पाता| साथ ही साथ कविता में असंगत तथ्य न आने पाएँ इस ओर भी कवि को ध्यान देना होगा| कवि का भाव-पक्ष विचार-पक्ष की अपेक्षा ज्यादा प्रबल है| कविता में शब्द-स्फीति पर भी कवि को नियंत्रण रखना होगा| कई अंश ऐसे हैं जोकि न भी होते तो कविता पर कोई खास प्रभाव नहीं पड़ता| कवि को अपनी कविता का विषय चुनते समय कथ्य की स्पष्टता का विशेष ध्यान रखना होगा| इसके अभाव में कविता का स्ट्रक्चर तो खड़ा हो जाता है लेकिन कोई केन्द्रीय भाव नहीं आ पाता जोकि शाब्दिक रूप से बिखरा-बिखरा कविता सा कुछ लगता तो है लेकिन मात्र इतने से वह कविता नहीं हो जाया करती|

कवि ने प्रकृति और मनुष्य के अंतर्संबंधों पर भी कुछ अच्छी कविताएँ लिखने की कोशिश की है| संग्रह में बेटी की चिंता, अन्दर की रामायण, मिट्टी का साहित्य, किसान कवि, शांति स्मारक, असली मूर्तियाँ, क्रूस पर कविता आदि कई अच्छी कविताएँ भी हैं| कवि ने कुछ अच्छे विषय उठाए हैं लेकिन कविता में उनका निर्वाह नहीं हो पाया है जैसे आधे मजदूर, दंगों का मुआवजा और रोटी शीर्षक कविता| कवि को ध्यान रखना चाहिए कि कविता लिखने के बाद उसमें संशोधन की गुंजाईश हमेशा बनी रहती है|

उम्मीद है लव मेरे द्वारा कही गयी उपरोक्त बातों को अन्यथा न लेंगे और अपने अध्ययन को बढ़ाते हुए आगे और अच्छी व प्रभावी कविताएँ रचेंगें| हिंदी कविता में वे अपने योगदान से पहचाने जाएँ मेरी यही कामना है| मेरी उनके प्रति हार्दिक शुभकामनाएँ!
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समीक्षक-
राहुल देव
मो. 09454112975