Tuesday, 23 December 2025

जीवन से जूझते लोक का यथार्थ

 डॉ विद्याभूषण

 

नवें दशक के लोकप्रिय एवं महत्वपूर्ण कथाकार कैलाश बनवासी के तीन कहानी संग्रह लक्ष्य एवं अन्य कहानियाँ’, ‘बाजार में रामधन’, ‘पीले कागज की उजली इबारतसहित लौटना नहीं हैउपन्यास प्रकाशित हो चुका है। इन संग्रहों में अनेकों महत्वपूर्ण कहानियाँ मौजूद हैं जिन्होंने हिन्दी कथा साहित्य को समृद्ध किया है। इनका चौथा कहानी संग्रह प्रकोप एवं अन्य कहानियाँकई मायनों में महत्वपूर्ण है। जहाँ समकालीन कहानी का केन्द्र मध्यवर्गीय जीवन बोध होता जा रहा है वहीं उन्होंने निम्नवर्गीय चरित्रों को अपनी कहानियों के केन्द्र में रखा है। इस संग्रह की संपूर्ण कहानियाँ आम कहानियों से हटकर हैं। इनकी यह खासियत है कि यह हमारे आस-पास के जीवन से ली गई हैं। जिन चीजों को हम देखते हैं, परखते हैं, महसूस करते हैं, जो हमारे जीवन के प्रतिदिन का जाना पहचाना हिस्सा है, कैलाश जीवन और समाज के उन्हीं संदर्भों का सूक्ष्म परीक्षण करते हैं और परीक्षण उपरांत ही अपनी कहानियों को गढ़ते हैं। पेशे से शिक्षक होने के कारण उनके जीवन का अधिकांश समय ग्रामीण क्षेत्र में गुजरा है इसलिए उन्हें अपनी जमीन से, आसपास के माहौल से, विभाग एवं विभागीय अमले से जीवन के खट्टे-मीठे अनुभव प्राप्त हुए हैं जो इनकी कहानियों में स्पष्ट रूप से दिखाई देते हैं। इनकी कहानियों में बेवजह की उठापटक दाँव-पेंच व प्रपंच नहीं है जिससे जीवन की गहन अनुभूति और वैचारिक प्रतिबद्धता स्वस्फूर्त ही अभिव्यंजित होती है। ये कहानियाँ समकालीन समाज में व्याप्त ज्वलंत समस्याओं सहित युगीन सच्चाईयों से भी पाठकों को रूबरू कराती हैं।

    संग्रह की पहली कहानी गाँव: कुछ दृश्यमें दर्शाया गया है कि जहाँ शहरों में चमचमाती अट्टालिकाएँ, दुकानें, मॉल्स, मल्टीप्लेक्स तेजी से निर्मित हो रहे हैं, जीवन शैली में हो रहे बदलाव, शहरों की चकाचौंध में फँसा व्यक्ति आधुनिकीकरण और बाजारू उत्पादों के गिरफ्त में फंसकर केवल अपने जीवित होने का एहसास कर पा रहा है, वहीं इन सबसे दूर ग्रामीण, श्रमिक, कामगार, युवा एवं वृद्ध स्त्रियाँ मौसमों की मार का निडरतापूर्वक मुकाबला कर अपने दैनिक जीवन के कार्यों का निपटारा करती हुई मेहनतकश कार्यों को भी पूरी तत्परता के साथ करती हैं। इनके बीच आपसी सहचर्य का एकमात्र माध्यम हँसी-ठिठोली ही होता है। वे सभी इसमें डूबकर आपस में एक-दूसरे के प्रति सहज अपनापन रखते हैं जैसे वे एक परिवार का हिस्सा हों। यह कहानी इन्हीं ग्रामीण कामगार स्त्रियों की विसंगतियों को व्यक्त करती है। साथ ही, इन स्थितियों के विरूद्ध संघर्ष करने की प्रेरणा देती है। यहाँ श्रम और संघर्ष का सौंदर्य देखते ही बनता है। यह कहानी सरल, सहज होने के बावजूद अपनी दृश्यात्मक अभिव्यक्ति के कारण पाठकों को प्रभावित करती हुई समूचे ग्रामीण परिवेश को अपनी रचनात्मकता से जीवंत कर देती है।

 

    अव्यक्त प्रेम की संजीदा अभिव्यक्ति है संग्रह की दूसरी कहानी प्रेम अप्रेम। नए-नए शिक्षक बने अल्हड़ युवा और भोली-भाली ग्रामीण युवती की मुलाकात बस यात्रा के दौरान होती है, जहाँ हुई बातचीत से वे एक-दूसरे के प्रति आकर्षित होते हैं। इस प्रेम की पुष्टि गाँव के मंडाई मेले में होती है, जहाँ युवती द्वारा युवा शिक्षक को तीन सफेद बिल्लियों का पोस्टर भेंट स्वरूप दिया जाता है। शिक्षक द्वारा पोस्टर को प्रेम-पत्र समझा जाता है। इसी जिज्ञास में कहानी बिना किसी प्रेमाकार लिए तब खत्म हो जाती है जब उस युवती को गाँव में आए अकाल की वजह से पलायन करना पड़ता है। कथाकार ने इस कहानी के माध्यम से छत्तीसगढ़ में पिछले कुछ वर्षों में महत्वपूर्ण समस्या बनकर उभरी पलायन की समस्या पर बड़ी गहराई से चिंता व्यक्त की है। साथ ही, युवा पीढ़ी के तमाम आधुनिक आचार-व्यवहार के बीच भी प्रेम के उद्दात्त मूल्यों को बचाने का भरसक प्रयास किया है।

 

    कहानी प्रकोपसंग्रह की प्रतिनिधि रचना है। यह कहानी भारतीय कृषक जीवन की तकलीफों, त्रासदियों, विद्रूपताओं, विडम्बनाओं के साथ ही उनके परिवार के साथ होने वाले समस्त अमानवीय व्यवहार के सच को भी उद्घाटित करती है। हमारा देश तकनीकी विकास के चरमोत्कर्ष पर है। फिर भी विडम्बना है कि भारतीय ग्राम अब भी अपना संपूर्ण विकास नहीं कर पाया है। इन ग्रामों में निवासरत कृषक रोग, शोक, विवाद, व कर्ज से ग्रसित हैं। तकनीकी रूप से सक्षम कृषकों को छोड़कर शेष पूर्ण रूप से मानसून पर ही निर्भर हैं। वनों की अंधाधुंध कटाई ने इस संकट को और अधिक गहरा दिया है। मानसून पर निर्भर कृषकों को कम व अधिक वर्षा के साथ ही बिजली, खाद, बीज, कीटनाशक सहित प्राकृतिक प्रकोपों जैसी समस्याओं से भी जूझना होता है। इन्हीं समस्याओं से जूझता प्रकोपकहानी का प्रमुख पात्र इतवारी जो कि भारतवर्ष के अन्य कृषकों की ही तरह है। ग्राम के ही दीनानाथ साहू से चार एकड़ जमीन फसल उगाने हेतु किराये पर लेता है समस्त परिवार द्वारा उस जमीन पर जी-तोड़ मेहनत कर फसल उगाता है। फसल उगने पर मानसून दगा दे जाता है और अकाल की स्थिति निर्मित हो जाती है। क्षेत्र में सरकार द्वारा पानी की कोई व्यवस्था नही की जाती क्षेत्रीय विधायक द्वारा पानी की व्यवस्था करने के संबंध में दिया गया आश्वासन केवल आश्वासन ही सिद्ध होता है। परेशान इतवारी द्वारा पत्नि के समस्त गहने गिरवी रख पानी की व्यवस्था की जाती है पानी पाकर फसलें लहलहा उठती है किन्तु फसल कटने से ठीक पहले भूरा माहो नामक बिमारी की चपेट में आ जाती है और कटने के लिए तैयार खड़ी फसल पूरी तरह तबाह हो जाती है। गले तक कर्ज में डूबा इतवारी इस घटना से विक्षिप्त सा हो जाता है और अंततः आत्महत्या कर लेता है।

 

    इस देश की सबसे बड़ी विड़म्बना है कि उसका अन्नदाता ही कर्ज में डूबकर आत्महत्या करने को विवश है। सरकारी तंत्रों की नसों में फैला भ्रष्टाचार का रक्त कैंसर पूरी तरह लाईलाज बीमारी का रूप धारण कर चुका है वह केवल आश्वासनों एवं झूठे वादों पर ही सीमित होकर रह गया है। शासन के पास न तो कृषकों के लिए कोई ठोस नीति है और न ही उन्हें होने वाले नुकसान की भरपाई के लिए कोई अच्छी योजना, यदि कुछ है भी तो उसमें इतने पेंच हैं कि सही समय पर उसका लाभ प्राप्त कर पाना कृषकों के लिए संभव नही हो पाता, बेचारा कृषक झूठे आश्वासनों पर विश्वास कर सर्वस्व लुटा अपने आपको ठगा सा महसूस करते हंै। वैसे भी ग्रामीण समाज में धार्मिक आस्था, अंधविश्वास, जातिगत व्यवस्था जैसे विषैले सर्प अपना फन फैलाये कृषकों को डसने को तैयार बैठे हैं ग्रामीण सामाजिक ढांचा पूरी तरह चरमरा गया है। कहानी प्रकोपइन्हीं सब भ्रष्ट व्यवस्थाओं की पोल खोलती है, इस कहानी का सबसे मार्मिक स्थल हैं इतवारी की लाश को पोस्टमार्डम उपरांत थाने से छुड़वाने हेतु उसके बेटे आजू को थानेदार मिश्रा के महत्वहीन व तकलीफ देह प्रश्नों के उत्तर देने पड़ते हैं मिश्रा जी का दूसरे दिन तीन सौ रूपये मिलने की प्रत्याशा में ही लाश ले जाने की बात कहना, आजू द्वारा अपना घर गिरवी रख तीन सौ रूपये का इंतजाम करना संवेदनशील पाठकों को गहरे से विचलित करता है।

 

भ्रष्टाचार की नाजायज औलादें थानेदार मिश्रा जैसे पात्र महान उपन्यासकार पे्रमचंद के उपन्यास गोदानकी उस घटना का स्मरण कराता है जब होरी की मृत्यु उपरांत गोदान की रस्म निभाने के दबाव में ब्राम्हणों को होरी की मृत्यु का कोई शोक नही होता बल्कि उन्हें दकियानूसी रीति रिवाजों के र्निवहन हेतु किये जा रहे गोदान का इंतजार होता है वैसे ही थानेदार मिश्रा का इतवारी की लाश ले जाने के लिए तीन सौ रूपये की माँग करना अमानवीयता का चरमोत्कर्ष है। कृषकों की ऐसी दुर्दशा और खेती के संकट के सच को उद्घाटित करती जनकवि धूमिल की ये पंक्तियाँ आज भी कालजयी प्रतीत होती हैं।

   

    इतनी हरियाली के बावजूद/अर्जुन को नही मालूम

    उसके गाल की हड्डी क्यों उभर आई/उसके बाल सफेद क्यों हो गये

    लोहे के दुकान में बैठा आदमी सोना/और इतने बड़े खेत में खड़ा आदमी मिट्टी क्यों हो गया है।

 

    भारतीय समाज के उच्छंृखल और अमानवीय विकास ने भ्रष्ट, अनैतिक, संवेदनहीन, अश्लील और अराजक युवा वर्ग को जन्म दिया है कहानियाँ शिविरएवं संतरेइन्ही अराजक, लम्पट व धूर्त युवाओं के समूह द्वारा किये जा रहे पल-पल के आचार-विचार व व्यवहारों को समग्रता के साथ व्यक्त करती है। यह वर्ग ग्रामीण जनों को अत्यंत हेय दृष्टि से देखता है इनकी नजरों में ग्रामीणों की कोई इज्जत व आत्मसम्मान नहीं हैं यह वर्ग हमेशा उनके आत्मसम्मान को ठेस पहुँचाने हेतु प्रयासरत होता है। अपनी झूठी आन, बान, शान के मद में चूर इन युवाओं का ना तो कोई अतीत है और ना ही कोई भविष्य ? इन लम्पट युवाओं का सामना जब अपने आत्मसम्मान के प्रति सचेत और सतर्क ग्रामीणों से होता है तो उनका प्रतिरोध एक चुनौती के रूप में उभरता है।

 

    कहानी शिविरडाॅ. वर्मा के नेतृत्व में लगे एन.एस.एस. यानी राष्ट्रीय सेवा योजना के गाँव मे लगे शिविर की है, जिसमें आये कालेज के युवा छात्रों द्वारा ग्रामीण स्त्रियों और युवतियों पर अश्लील इशारे करना और छेड़खानी करने से शुरू होती है और छात्र सुरेश द्वारा कथा पात्र बसंत की छोटी बहन पर किये गये बलात्कार की नाकाम कोशिश पर खत्म होती है बात घर तक पहुँचने पर बसंत के काका एवं ग्रामीण द्वारा आरोपी छात्र सुरेश और उसके साथियों की जमकर पिटाई की जाती है।   बदले की भावना से ग्रसित सुरेश और उसके साथियों द्वारा ग्रामीणों को देख लेने की बात कहता है। इस घटना का ज्ञान जब बसंत को होता है तो उसे सुरेश द्वारा अपनी पिटाई की आशंका घेर लेती है उसकी आँखों के सामने वह दृश्य उभरने लगता है जब बिना किसी बात के सुरेश द्वारा एक गरीब छात्र को बुरी तरह पीटा गया था। सुरेश से छात्र तो छात्र प्रोफेसर तक भयभीत होते हैं। आंतरिक अंर्तद्वंद्वं में फँसा बसंत है कभी गाँव से शहर कालेज आने-जाने की युक्तियाँ सोचता तो कभी अपनी छोटी बहन को कोसता नशे में गाँव वालों की ओर से सुरेश से माफी माँगने शिविर की ओर चल पड़ता है।

 

    कहानी संतरेरेलगाड़ी के डिब्बे में संतरे बेचने वाली महिलाओं के साथ द्विअर्थी संवादों में वार्तालाप कर मजे लेना उन पर अश्लील फब्तियाँ कसना, अश्लील इशारे करना और मौका मिलने पर उन महिलाओं को छूने की चेष्टा कर रहें नीचे की बर्थ में बैठे दो युवा जिनके उपर की बर्थ में बैठे लेखक कवि कृपाशंकर चकोर को ये सब चीजें नागवार गुजरती है भीतर ही भीतर उनके मन में आक्रोश उत्पन्न होता है सारे डिब्ब में लगभग इसी प्रकार के हालात होते हैं, चाहकर भी कोई इन सबका विरोध नही कर पाता, कुछ देर बाद जब युवकों द्वारा एक संतरेवाली महिला को छूने की चेष्टा की जाती है तो महिला द्वारा इन युवाओं का प्रतिरोध किया जाता है सारा माजरा समझ कृपाशंकर चकोर अपने भीतर उमड़ रही प्रतिरोध की अग्नि उस संतरे वाली महिला के भीतर पाकर अत्यंत प्रसन्न होते हैं। सरल व शांत स्वभाव की संतरेवाली महिला की अप्रत्याशित आक्रामकता और प्रतिरोध के आगे धूर्त, लम्पट, अराजक आधुनिक युवाओं का जोश ठंडा हो जाता है उनके होश ठिकाने आ जाते हैं संतरेवाली महिला के प्रतिरोध उपरांत रेलगाड़ी के डिब्बे में डरे सहमें आतंकित लोगों की हलचल और सक्रियता वापस लौट आती है। धूर्त, अराजक युवकों के समूह का आतंक खत्म हो जाता है। कृपाशंकर चकोर उसी संतरेवाली महिला से संतरा खरीद आस्वादन करते हुए मन ही मन एक आधुनिक बर्बर हमले के प्रतिरोध में अपनी विजयघोष का एहसास करते हैं।

 

    कहानी गोमती एक नदी का नाम हैवर्तमान आर्थिक समय में समाज के भीतर बचे जीवन मूल्यों को टटोलती है। कहानी ग्रामीण मजदूरन स्त्री गोमती जिसका पति चोरी के इल्जाम में जेल में बंद है जिसका जुर्म है धान कोचिया का पाँच बोरा धान अपनी मजदूरी के एवज में बिना पूछे बेचना। तीन बच्चों की माँ गोमती को परिवार के पालन-पोषण हेतु बाड़ी में काम करना पड़ता है काम पर बने रहने के लिए मजबूरीवश अपने बाड़ी मालिक द्वारा किये जा रहे छोटे-मोटे शोषण को सहना पड़ता है आर्थिक अभाव से ग्रसित गोमती अंततः अपनी देह तक सौंपने को तैयार हो जाती है। आधुनिक समय में व्यक्ति के मन में जरूरतमंद व समर्पित स्त्री के प्रति प्रेम और संवेदना का कोई स्थान नही होता वह हर हाल में ऐसी स्त्री को पाने की चेष्टा करता है। किन्तु यह कहानी अंत में अपने मर्म को प्रकट करती है जब बाड़ी मालिक द्वारा गोमती की देह को पाने की तीव्र इच्छा रखने पर भी कमरे में अकेले मिलने पर गोमती द्वारा बच्चे का जिक्र करने पर उसे अपने बिस्तर से भगा देता है साथ ही दुबारा काम पर आने से भी मना कर देना जैसा अविश्वसनीय कृत्य लेखक द्वारा कहीं न कहीं मानवीय मूल्यों को बचा लेने का सार्थक प्रयास है।

 

    ग्रामीण व्यक्ति हर तरह से सरल, सहज और भोला-भाला होता है इन ग्रामीण जनों के साथ कोई भी शहर का जालसाज व्यक्ति आसानी से छल कर सकता है यही होता है। कहानी काका के जीवन की एक घटनामें ग्रामीण वृद्ध स्त्री काकी जो कि अपने सिर पर दूध, दही, घी, मही, बेचकर अपने परिवार का पालन-पोषण करती है दुकान में हुई बहस पर गुस्से में आकर दुकान में बैठे युवक द्वारा काकी का सिर फोड़ दिया जाता है युवक के पिता द्वारा काकी को अस्पताल में भर्ती कराया जाता है पुलिस में रिर्पोट दर्ज न करने के एवज में वह अस्पताल में हो रहे खर्च उठाने को तैयार हो जाता है साथ ही उसके द्वारा चार सौ रूपये भी जमा कराया जाता है, किन्तु वृद्ध ग्रामीण काकी और काका अपने आप को उस समय ठगा सा महसूस करते हैं जब निर्धारित तिथि पर वह दुकानदार अस्पताल का आगामी खर्चा देने नहीं आता इस खर्च को वहन करने में काकी के गहने तक गिरवी रखने पड़ते हैं। यह कहानी आधुनिक समाज में खत्म हो रहे मानवीय मूल्यों को बड़ी मार्मिकता से रेखांकित करती हुई, शहरों में रहने वाले धूर्त, चालाक और मौकापरस्त लोगों की गहरी पड़ताल करती है साथ ही ऐसे लोगों से हमेशा सतर्क व सचेत रहने की प्रेरणा भी देती है।

    छटवें वेतनमान के समय में दो कौड़ी का आदमीइस संग्रह की सबसे मार्मिक कहानी है। यह एक अपंग किन्तु कर्मठ, जुझारू, ईमानदार, मानसेवी (भृत्य) संतोष के जीवन का हौलनाक बयान है। आर्थिक तंगी, शारीरिक अपंगता, नैतिक बोध, और स्वभावगत ईमानदारी इस मूल्यहीन समाज में उसकी स्थिति को और अधिक दयनीय व दारूण बना देती है। स्कूल के प्राचार्य व नियमित शिक्षकों द्वारा नित नये हथकंडे अपनाकर उस पर दबाव बनाया जाता है कि वह दिन में कार्य करने के अलावा रात में स्कूल की चैंकीदारी भी करें, संतोष द्वारा वेतन बढ़ाने की मांग और नियमित शिक्षकों का प्रतिरोध करने पर अनावश्यक दोषारोपण कर उसका मासिक मानदेय तक काट दिया जाता है इस घटना से आहत होकर संतोष मानसेवी (भृत्य) की नौकरी छोड़कर जीवन जगत में व्याप्त तमाम अनैतिक कार्यों में लग जाता है। यह कहानी अंत में एहसास करा ही देती है कि जिसके पास पद, पैसा, रूतबा नही है वह इस आधुनिक समय में हर जगह मिसफीट होता है, साथ ही अपने आपको देश के सिरमौर व समाज निर्माता समझने वाले निकम्मे, निठल्ले, चापलूस शिक्षकों के गैर शिक्षकीय घृणित व अनैतिक कृत्यों सहित उनके द्वारा किये जाने वाले शोषणों के सच को भी उद्घाटित करती है।

 

    पुरूष प्रधान समाज में पुत्री को जन्म देना एक अभिशाप से कम नहीं है। ज्ञात होने पर उसकी गर्भ में ही हत्या तक के प्रयास होने लगते हैं ऐसा ही कुछ कहानी उसके दरबार मेंकी नायिका डाॅली के साथ घटित होता है। शादी उपरांत पहली पुत्री होने पर पति व सास द्वारा उसे व मायके वालों को तरह-तरह के हथकंडे अपनाकर अपमानित व प्रताड़ित किया जाता है। इसका अंत तब होता है जब उसके ससुराल वाले ग्रामीण साधवी माताजी के दरबार में पहुँचते है जहाँ अपने आपको साधवी मानने वाली माताजी डाॅली के भाई पर मोहित हो उसके सामने अपने साथ रात गुजारने का प्रस्ताव रखती है स्वीकृति उपरांत एवज में माताजी द्वारा डाॅली के ससुराल वालों से कहा जाता है की वह घर की लक्ष्मी है उसे प्रताड़ित करने पर उनके घर की सुख-समृद्धि, ऐश्वर्य नष्ट होने का भय है उसे सुखी रखने पर ही घर में सुख, शांति रहेगी।

 

    यह कहानी वैज्ञानिक युग में धर्म और आस्था के नाम पर फैले अंधविश्वास के सहारे समाज में अपनी गहरी पैठ बना चुके बाबाओं और माताओं के कुटिल चरित्र को उजागर करती है। यह कहानी समाज के लिए नासूर बन चुकी इनकी धंधेबाजी, व्यक्ति को संतुष्ट करने हेतु रचे गए प्रपंच एवं उनके छद्म चालों की कलई तो खोलती ही है साथ ही पुत्र-पुत्री भेदभाव व कन्या-भ्रूण हत्या जैसी ज्वलंत समस्या को भी बड़ी संजीदगी से प्रस्तुत करती है। इस तरह कहा जा सकता है कि संपूर्ण मानव जाति के जीवन मूल्य जैसे नैतिकता, संवेदनशीलता, मानवीयता, संघर्ष व प्रतिरोध इस संग्रह की कहानियों में प्रमुखता से मौजूद हैं।

    कैलाश बनवासी की भाषा सरल, सहज, स्पष्ट होने के साथ-साथ पात्रानुकूल भी है जो इन कहानियों की सबसे बड़ी ताकत है। कहानियों में पात्र जिस प्रकार के होते हैं वे उनसे उसी प्रकार की भाषा का प्रयोग कराते हैं जिससे पाठकों के मन में पात्र एवं उसकी मानसिकता की स्पष्ट छवि उभरती है और वे जीवंत हो उठते हैं। कहानियों में छोटे-छोटे वाक्य एक-दूसरे से जुड़कर एक सधी हुई भाषिक संरचना का निर्माण करते हैं। बीच-बीच में मुहावरों, कहावतों एवं छत्तीसगढ़ी के शब्दों का प्रयोग भाषा में नई ताजगी का अनुभव कराते हैं। वे बहुप्रचलित भाषा के खिलंदड़ेपन से भी अपनी कहानियों को भरसक बचाते हैं।

    इस संग्रह की समस्त कहानियाँ सरल, सहज शिल्प में कही गई हैं, शिल्प और भाषा में किसी प्रकार की कृत्रिमता नहीं दिखाई देती है। कहानियों की विषय-वस्तु अप्रत्याशित फैलाव लिए नहीं वरन् बेहद लघु एवं वांछित कलेवर में सुसंगठित हैं। कहानी गाँव: कुछ दृश्यअलग फार्म में अवश्य है किन्तु कहानी सीधे-सपाट वर्णनात्मक शिल्प में होते हुए भी जिस तरह जीवन और प्राकृतिक दृश्यों को रचती है वह बेहद कलात्मक है।

 किसी भी समाज में लोक-जीवन का आधार गाँवों के लोग, उनके रीति-रिवाज, ईर्ष्या-द्वेष, मेल-मिलाप, उनका स्वभाव, गाँवों की संपूर्ण समस्याएँ, गाँव के अलग-अलग चरित्र, उनकी मानसिकता, खेत-खलिहान, बाग-बगीचे, पंचायत, चौपाल, राजनीति, हिंसा, गाँव के संस्कार, परम्पराएँ, नया ज्ञान, संचार माध्यम, शिक्षा, नगरों से संबंध के कारण उनमें आ रहे बदलाव आदि का समन्वय होता है। इस संग्रह की संपूर्ण कहानियों में लोक जीवन के समस्त सौंदर्य, उसकी विसंगतियों के साथ अभिव्यक्त हुए हैं। ये कहानियाँ लोक जीवन के सहज लोक पक्ष को रेखाँकित करती हुई उसके भीतर सक्रिय सामाजिक यथार्थ को भी परखती हैं। जहाँ लोक जीवन व संस्कृति को खत्म करने की साजिश चल रही है ये कहानियाँ उसके प्रतिरोध में उस लोक को बचाने की पुरजोर कोशिश करती हैं। अधिकांश कहानियाँ घटना प्रधान है, संपूर्ण घटनाएँ मोतियों की माला में गूँथी गई मोतियों की तरह ही एक दूसरे से अपने-आप जुड़ती जाती हैं।

    कैलाश बनवासी अपने समय, समाज एवं परिवेश के प्रति प्रतिबद्ध कथाकार हैं, जिसकी अभिव्यक्ति पूरी गंभीरता के साथ इनकी कहानियों में स्पष्ट रूप से परिलक्षित होता है। आधुनिकता के इस दौर में जब बहुत सारे लोग एक तरह से परास्त हो चुके हैं, हार की मानसिकता में हैं, ऐसे समय में इस संग्रह की कहानियाँ यह आश्वस्त करती हैं कि अभी भी कुछ है जो बचा है, सब कुछ खत्म नहीं हुआ है।