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Saturday, 16 January 2016

समीक्षा - लव कुमार लव के कविता संग्रह पर राहुल देव


अपनी मिट्टी से जुड़ी कविताएँ

कविता संग्रह- मिट्टी का साहित्य
कवि- लव कुमार लव
प्रकाशक- सतलुज प्रकाशन, हरियाणा
प्रकाशन वर्ष- 2015
पृष्ठ- 144
मूल्य- 250/-



कविता दुनिया की सबसे पवित्र और आदिम कला है| जब किसी भाषा का पहली बार आविष्कार हुआ होगा, तो जरूर कविता में ही यह जन्मी होगी| मनुष्य के लिए यह उतनी ही जरूरी रही होगी जितना हवा, पानी, भोजन और आवास| वर्तमान समय में बहुत से कवि अपने-अपने परिवेश में अपनी अभिव्यक्ति कविता में कर रहे हैं| लव कुमार लव भी उनमें से एक हैं| लव हरियाणा में हिंदी के अध्यापक हैं और साहित्य से गहरे तक जुड़े हुए हैं| मिट्टी का साहित्य उनका पहला कविता संग्रह है| इस संग्रह में उनकी कुल 68 कविताएँ संग्रहीत हैं|

प्रस्तुत संग्रह की कविताएँ पढ़ने से साफ़ होता है कि लव सामाजिक सरोकार से जुड़े रहने वाले एक संवेदनशील कवि बनने की प्रक्रिया में हैं| उनकी कविताओं के विषय समाज की विसंगतियों और यथार्थ के अंतर्विरोधों की उपज हैं| इस ओर से कवि की चिंताएँ इनकी कविता में व्यक्त हुई हैं| कवि अपनी काव्य-यात्रा के प्रारंभिक दौर में है| लव के पास अच्छी भाषा है, शैली है, शिल्प है बस उसे समकालीन साहित्य से जोड़कर देखने और रचना के स्तर पर और मांजने की आवश्यकता प्रतीत होती है| जब तक कवि कविता लिखने की पर्याप्त मानसिक तैयारी नहीं करता तब तक सच्ची कविता नहीं पैदा होती|

परछाई पहरेदार की नामक कविता में कवि की निम्न पंक्तियाँ देखें, “चल रहा हूँ उस युग की ओर/ बड़ी परछाई का बोझ लिए/ एक नयी सुबह की ओर/ लाठी बजाता, आवाज़ लगाता/ जागते रहो! जागते रहो!” या अपनी दलित शीर्षक कविता में कवि कहता है, “मैं ही आदि हूँ/ मैं ही अंत हूँ/ फिर भी समाज में/ अल्प पोषित क्यों हूँ/ इतना करने पर भी/ मैं ही शोषित क्यों हूँ ?”वह इन कविताओं में निरंतर प्रश्न उठाते हैं| कवि सार्वभौम मानवता का पक्षधर है| संग्रह की एक और महत्त्वपूर्ण कविता अपने कहन की वजह से अपना ध्यान आकर्षित करती है| शीर्षक है मजदूर चौक इस कविता में कवि एक मजदूर का चेहरा पढ़ने की कोशिश करता दिखता है| लव  लिखते हैं, “चेहरे पढ़ता हूँ कुछ क्षण रूककर/ कोशिश करता हूँ/ इनके अन्दर झाँकने की”|

लव को कविता की लय पर भी ध्यान देने की जरूरत है| कई कविताएँ इस कारण अपने पाठ में रूकावट जैसा आभास देती लगीं| वह कविता में स्मृति में जाते हैं फिर वर्तमान में वापस आते हैं लेकिन दोनों के मध्य कोई तार्किक रिश्ता प्रस्तुत नहीं कर पाते जिस कारण कविता एक नास्टैल्जिक विवरण बनकर रह जाती है| विषय को ज्यों का त्यों प्रस्तुत कर देने की अपेक्षा लव को उनमें बिम्ब लाकर अपनी कल्पना से जोड़ना चाहिए, यथार्थ की ज़मीन को छोड़े बगैर| इस ओर कवि को ध्यान देने की जरूरत है तभी उनकी कविता अपनी कोई स्वतंत्र पहचान बना पाने में सक्षम हो सकेगी| ऐसा नहीं है कि लव की कविता में बिम्ब नहीं हैं लेकिन वे उन बिम्बों को कोई उभार नहीं दे सके| कविता पढ़ने के बाद पाठक के मन में जो स्पेस बनना चाहिए वह नहीं बन पाता| साथ ही साथ कविता में असंगत तथ्य न आने पाएँ इस ओर भी कवि को ध्यान देना होगा| कवि का भाव-पक्ष विचार-पक्ष की अपेक्षा ज्यादा प्रबल है| कविता में शब्द-स्फीति पर भी कवि को नियंत्रण रखना होगा| कई अंश ऐसे हैं जोकि न भी होते तो कविता पर कोई खास प्रभाव नहीं पड़ता| कवि को अपनी कविता का विषय चुनते समय कथ्य की स्पष्टता का विशेष ध्यान रखना होगा| इसके अभाव में कविता का स्ट्रक्चर तो खड़ा हो जाता है लेकिन कोई केन्द्रीय भाव नहीं आ पाता जोकि शाब्दिक रूप से बिखरा-बिखरा कविता सा कुछ लगता तो है लेकिन मात्र इतने से वह कविता नहीं हो जाया करती|

कवि ने प्रकृति और मनुष्य के अंतर्संबंधों पर भी कुछ अच्छी कविताएँ लिखने की कोशिश की है| संग्रह में बेटी की चिंता, अन्दर की रामायण, मिट्टी का साहित्य, किसान कवि, शांति स्मारक, असली मूर्तियाँ, क्रूस पर कविता आदि कई अच्छी कविताएँ भी हैं| कवि ने कुछ अच्छे विषय उठाए हैं लेकिन कविता में उनका निर्वाह नहीं हो पाया है जैसे आधे मजदूर, दंगों का मुआवजा और रोटी शीर्षक कविता| कवि को ध्यान रखना चाहिए कि कविता लिखने के बाद उसमें संशोधन की गुंजाईश हमेशा बनी रहती है|

उम्मीद है लव मेरे द्वारा कही गयी उपरोक्त बातों को अन्यथा न लेंगे और अपने अध्ययन को बढ़ाते हुए आगे और अच्छी व प्रभावी कविताएँ रचेंगें| हिंदी कविता में वे अपने योगदान से पहचाने जाएँ मेरी यही कामना है| मेरी उनके प्रति हार्दिक शुभकामनाएँ!
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समीक्षक-
राहुल देव
मो. 09454112975


1 comment:

  1. आदरणीय लव कुमार जी की पुस्तक तो मैंने नहीं पढ़ी , लेकिन प्रिय राहुल की समीक्षा द्वरा लगता है कि संग्रह अवश्य ही पढ़ने के योग्य होगा तभी स्पष्ट हो सकेगा।

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