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Thursday, 14 January 2016

कहानी - चौथी का जोड़ा

इस्मत चुग़ताई

          सहदरी के चौके पर आज फिर साफ-सुथरी जाजम बिछी थी। टूटी-फूटी खपरैल की झिर्रियों में से धूप के आडे-तिरछे कतले पूरे दालान में बिखरे हुए थे। मोहल्ले टोले की औरतें खामोश और सहमी हुई-सी बैठी हुई थीं; जैसे कोई बडी वारदात होने वाली हो। माँओं ने बच्चे छाती से लगा लिए थे। कभी-कभी कोई मुनहन्नी-सा चरचरम बच्चा रसद की कमी की दुहाई देकर चिल्ला उठता। नांय-नायं मेरे लाल!दुबली-पतली माँ उसे अपने घुटने पर लिटाकर यों हिलाती, जैसे धान-मिले चावल सूप में फटक रही हो और बच्चा हुंकारे भरकर खामोश हो जाता।
          आज कितनी आस भरी निगाहें कुबरा की माँ के मुतफक्किर चेहरे को तक रही थीं। छोटे अर्ज की टूल के दो पाट तो जोड़ लिए गए, मगर अभी सफेद गजी क़ा निशान ब्योंतने की किसी की हिम्मत न पड़ती थी। कांट-छांट के मामले में कुबरा की माँ का मरतबा बहुत ऊँचा था। उनके सूखे-सूखे हाथों ने न जाने कितने जहेज सँवारे थे, कितने छठी-छूछक तैयार किए थे और कितने ही कफन ब्योंते थे। जहाँ कहीं मुहल्ले में कपडा कम पड़ ज़ाता और लाख जतन पर भी ब्योंत न बैठती, कुबरा की माँ के पास केस लाया जाता। कुबरा की माँ कपड़े क़े कान निकालती, कलफ तोड़तीं, कभी तिकोन बनातीं, कभी चौखूंटा करतीं और दिल ही दिल में कैंची चलाकर आँखों से नाप-तोलकर मुस्कुरा उठतीं।
          आस्तीन और घेर तो निकल आएगा, गिरेबान के लिए कतरन मेरी बकची से ले लो और मुश्किल आसान हो जाती। कपडा तराशकर वो कतरनों की पिण्डी बनाकर पकडा देतीं।


          पर आज तो गजी क़ा टुकडा बहुत ही छोटा था और सबको यकीन था कि आज तो कुबरा की माँ की नाप-तोल हार जाएगी। तभी तो सब दम साधे उनका मुँह ताक रही थीं। कुबरा की माँ के पुर-इसतकक़ाल चेहरे पर फिक्र की कोई शक्ल न थी। चार गज गज़ी के टुकडे क़ो वो निगाहों से ब्योंत रही थीं। लाल टूल का अक्स उनके नीलगूं जर्द चेहरे पर शफक़ की तरह फूट रहा था। वो उदास-उदास गहरी झुर्रियाँ अँधेरी घटाओं की तरह एकदम उजागर हो गईं, जैसे जंगल में आग भड़क़ उठी हो और उन्होंने मुस्कुराकर कैंची उठायी।
          मुहल्लेवालों के जमघटे से एक लम्बी इत्मीनान की साँस उभरी। गोद के बच्चे भी ठसक दिए गए। चील- जैसी निगाहों वाली कुंवारियों ने लपाझप सुई के नाकों में डोरे पिरोए। नई ब्याही दुल्हनों ने अंगुश्ताने पहन लिए। कुबरा की माँ की कैंची चल पड़ी थी।
          सहदरी के आखिरी कोने में पलंगडी पर हमीदा पैर लटकाए, हथेली पर ठोड़ी रखे दूर कुछ सोच रही थी।
          दोपहर का खाना निपटाकर इसी तरह बी-अम्मां सहदरी की चौकी पर जा बैठती हैं और बकची खोलकर रंग-बिरंगे कपड़ों का जाल बिखेर दिया करती हैं। कूंडी के पास बैठी बरतन माँजती हुई कुबरा कनखियों से उन लाल कपडों को देखती तो एक सुर्ख छिपकली-सी उसके जर्दी मायल मटियाले रंग में लपक उठती। रूपहली कटोरियों के जाल जब पोले-पोले हाथों से खोलकर अपने जानुओं पर फैलाती तो उसका मुरझाया हुआ चेहरा एक अजीब अरमान भरी रौशनी से जगमगा उठता। गहरी संदूकों-जैसी शिकनों पर कटोरियों का अक्स नन्हीं-नन्हीं मशालों की तरह जगमगाने लगता। हर टाँके पर जरी का काम हिलता और मशालें कंपकंपा उठतीं।
          याद नहीं कब इस शबनमी दुपट्टे के बने-टके तैयार हुए और गाजी क़े भारी कब्र-जैसे सन्दूक की तह में डूब गए। कटोरियों के जाल धुंधला गए। गंगा-जमनी किरनें मान्द पड़ गयीं। तूली के लच्छे उदास हो गए। मगर कुबरा की बारात न आयी। जब एक जोड़ा पुराना हुआ जाता तो उसे चाले का जोड़ा कहकर सेंत दिया जाता और फिर एक नए जोड़े क़े साथ नई उम्मीदों का इफतताह (शुरुआत) हो जाता। बड़ी छानबीन के बाद नई दुल्हन छाँटी जाती। सहदरी के चौके पर साफ-सुथरी जाजम बिछती। मुहल्ले की औरतें हाथ में पानदान और बगलों में बच्चे दबाए झाँझें बजाती आन पहुँचतीं।
          ‘छोटे कपड़े क़ी गोट तो उतर आएगी, पर बच्चों का कपड़ा न निकलेगा।‘ ‘लो बुआ लो, और सुनो। क्या निगोड़ी भारी टूल की चूलें पडेंग़ी?’ और फिर सबके चेहरे फिक्रमन्द हो जाते। कुबरा की माँ खामोश कीमियागर की तरह आँखों के फीते से तूलो-अर्ज नापतीं और बीवियाँ आपस में छोटे कपड़े क़े मुताल्लिक खुसर-पुसर करके कहकहे लगातीं। ऐसे में कोई मनचली कोई सुहाग या बन्ना छेड़ देती, कोई और चार हाथ आगे वाली समधनों को गालियाँ सुनाने लगती, बेहूदा गन्दे मजाक और चुहलें शुरु हो जातीं। ऐसे मौके पर कुंवारी-बालियों को सहदरी से दूर सिर ढांककर खपरैल में बैठने का हुक्म दे दिया जाता और जब कोई नया कहकहा सहदरी से उभरता तो बेचारियाँ एक ठण्डी साँस भरकर रह जातीं। अल्लाह! ये कहकहे उन्हें खुद कब नसीब होंगे। इस चहल-पहल से दूर कुबरा शर्म की मारी मच्छरों वाली कोठरी में सर झुकाए बैठी रहती है। इतने में कतर-ब्योंत निहायत नाजुक़ मरहले पर पहुँच जाती। कोई कली उलटी कट जाती और उसके साथ बीवियों की मत भी कट जाती। कुबरा सहमकर दरवाजे क़ी आड़ से झाँकती।
          यही तो मुश्किल थी, कोई जोड़ा अल्लाह-मारा चैन से न सिलने पाया। जो कली उल्टी कट जाय तो जान लो, नाइन की लगाई हुई बात में जरूर कोई अड़ंगा लगेगा। या तो दूल्हा की कोई दाश्त: (रखैल) निकल आएगी या उसकी माँ ठोस कड़ों का अड़ंगा बाँधेगी। जो गोट में कान आ जाय तो समझ लो महर पर बात टूटेगी या भरत के पायों के पलंग पर झगड़ा होगा। चौथी के जोड़े क़ा शगुन
बड़ा नाजुक़ होता है। बी-अम्मां की सारी मश्शाकी और सुघड़ापा धरा रह जाता। न जाने ऐन वक्त पर क्या हो जाता कि धनिया बराबर बात तूल पकड़ ज़ाती। बिसमिल्लाह के जोर से सुघड़ माँ ने जहेज ज़ोड़ना शुरु किया था। जरा सी कतर भी बची तो तेलदानी या शीशी का गिलाफ सीकर धनुक-गोकरू से संवार कर रख देती। लड़क़ी का क्या है, खीरे-ककड़ी सी बढ़ती है। जो बारात आ गयी तो यही सलीका काम आएगा।


          और जब से अब्बा गुजरे, सलीके क़ा भी दम फूल गया। हमीदा को एकदम अपने अब्बा याद आ गए। अब्बा कितने दुबले-पतले, लम्बे जैसे मुहर्रम का अलम! एक बार झुक जाते तो सीधे खड़े होना दुश्वार था। सुबह ही सुबह उठकर नीम की मिस्वाक (दातुन) तोड़ लेते और हमीदा को घुटनों पर बिठाकर जाने क्या सोचा करते। फिर सोचते-सोचते नीम की मिस्वाक का कोई फूँसड़ा हलक में चला जाता और वे खाँसते ही चले जाते। हमीदा बिगड़क़र उनकी गोद से उतर जाती। खाँसी के धक्कों से यूँ हिल-हिल जाना उसे कतई पसन्द नहीं था। उसके नन्हें-से गुस्से पर वे और हँसते और खाँसी सीने में बेतरह उलझती, जैसे गरदन-कटे कबूतर फड़फ़डा रहे हों। फिर बी-अम्मां आकर उन्हें सहारा देतीं। पीठ पर धपधप हाथ मारतीं।
          ‘तौबा है, ऐसी भी क्या हँसी।अच्छू के दबाव से सुर्ख आँखें ऊपर उठाकर अब्बा बेकसी से मुस्कराते। खाँसी तो रुक जाती मगर देर तक हाँफा करते। कुछ दवा-दारू क्यों नहीं करते? कितनी बार कहा तुमसे। बड़े शफाखाने का डॉक्टर कहता है, सूइयाँ लगवाओ और रोज तीन पाव दूध और आधी छटांक मक्खन।‘ ‘ए खाक पड़े इन डाक्टरों की सूरत पर! भल एक तो खाँसी, ऊपर से चिकनाई! बलगम न पैदा कर देगी?’ ‘हकीम को दिखाओ किसी।‘ ‘दिखाऊँगा।अब्बा हुक्का गुड़ग़ुड़ाते और फिर अच्छू लगता। आग लगे इस मुए हुक्के को! इसी ने तो ये खाँसी लगायी है। जवान बेटी की तरफ भी देखते हो आँख उठाकर?’
          और अब अब्बा कुबरा की जवानी की तरफ रहम-तलब निगाहों से देखते। कुबरा जवान थी। कौन कहता था जवान थी? वो तो जैसे बिस्मिल्लाह (विद्यारम्भ की रस्म) के दिन से ही अपनी जवानी की आमद की सुनावनी सुनकर ठिठक कर रह गयी थी। न जाने कैसी जवानी आयी थी कि न तो उसकी आँखों में किरनें नाचीं न उसके रुखसारों पर जुल्फ़ें परेशान हुईं, न उसके सीने पर तूफान उठे और न कभी उसने सावन-भादों की घटाओं से मचल-मचलकर प्रीतम या साजन माँगे। वो झुकी-झुकी, सहमी-सहमी जवानी जो न जाने कब दबे पाँव उस पर रेंग आयी, वैसे ही चुपचाप न जाने किधर चल दी। मीठा बरस नमकीन हुआ और फिर कड़वा हो गया।
          अब्बा एक दिन चौखट पर औंधे मुँह गिरे और उन्हें उठाने के लिए किसी हकीम या डाक्टर का नुस्खा न आ सका।
           और हमीदा ने मीठी रोटी के लिए जिद करनी छोड़ दी। और कुबरा के पैगाम न जाने किधर रास्ता भूल गए। जानो किसी को मालूम ही नहीं कि इस टाट के परदे के पीछे किसी की जवानी आखिरी सिसकियाँ ले रही है और एक नई जवानी साँप के फन की तरह उठ रही है। मगर बी-अम्मां का दस्तूर न टूटा। वो इसी तरह रोज-रोज दोपहर को सहदरी में रंग-बिरंगे कपड़े फ़ैलाकर गुडियों का खेल खेला करती हैं।
          कहीं न कहीं से जोड़ ज़मा करके शरबत के महीने में क्रेप का दुपट्टा साढ़े सात रुपए में खरीद ही डाला। बात ही ऐसी थी कि बगैर खरीदे गुज़ारा न था। मंझले मामू का तार आया कि उनका बड़ा लड़क़ा राहत पुलिस की ट्रेनिंग के सिलसिले में आ रहा है। बी-अम्मां को तो बस जैसे एकदम घबराहट का दौरा पड़ ग़या। जानो चौखट पर बारात आन खड़ी हुई और उन्होंने अभी दुल्हन की माँग अफशां भी नहीं कतरी। हौल से तो उनके छक्के छूट गए। झट अपनी मुँहबोली बहन, बिन्दु की माँ को बुला भेजा कि बहन, मेरा मरी का मुँह देखो जो इस घड़ी न आओ।
          और फिर दोनों में खुसर-पुसर हुई। बीच में एक नजर दोनों कुबरा पर भी डाल लेतीं, जो दालान में बैठी चावल फटक रही थी। वो इस कानाफूसी की जबान को अच्छी तरह समझती थी।


          उसी वक्त बी-अम्मां ने कानों से चार माशा की लौंगें उतारकर मुँहबोली बहन के हवाले कीं कि जैसे-तैसे करके शाम तक तोला भर गोकरू, छ: माशा सलमा-सितारा और पाव गज नेफे के लिये टूल ला दें। बाहर की तरफ वाला कमरा झाड़-पौंछकर तैयार किया गया। थोडा सा चूना मंगा कर कुबरा ने अपने हाथों से कमरा पोत डाला। कमरा तो चिट्टा हो गया, मगर उसकी हथेलियों की खाल उड़ ग़यी। और जब वो शाम को मसाला पीसने बैठी तो चक्कर खाकर दोहरी हो गयी। सारी रात करवटें बदलते गुजरी। एक तो हथेलियों की वजह से, दूसरे सुबह की गाड़ी से राहत आ रहे थे।
          ‘अल्लाह! मेरे अल्लाह मियाँ, अबके तो मेरी आपा का नसीब खुल जाए। मेरे अल्लाह, मैं सौ रकात नफिल (एक प्रकार की नमाज) तेरी दरगाह में पढूँगी।हमीदा ने फजिर की नमाज पढक़र दुआ माँगी।
          सुबह जब राहत भाई आए तो कुबरा पहले से ही मच्छरोंवाली कोठरी में जा छुपी थी। जब सेवइयों और पराठों का नाश्ता करके बैठक में चले गए तो धीरे-धीरे नई दुल्हन की तरह पैर रखती हुई कुबरा कोठरी से निकली और जूठे बर्तन उठा लिए।
          ‘लाओ मैं धो दूँ बी आपा।हमीदा ने शरारत से कहा। नहीं।वो शर्म से झुक गयीं। हमीदा छेड़ती रही, बी-अम्मां मुस्कुराती रहीं और क्रेप के दुपट्टे में लप्पा टाँकती रहीं।
          जिस रास्ते कान की लौंग गयी थी, उसी रास्ते फूल, पत्ता और चाँदी की पाजेब भी चल दी थीं।
और फिर हाथों की दो-दो चूडियाँ भी, जो मँझले मामू ने रंडापा उतारने पर दी थीं। रूखी-सूखी खुद खाकर आए दिन राहत के लिए परांठे तले जाते, कोफ्ते, भुना पुलाव महकते। खुद सूखा निवाला पानी से उतारकर वो होने वाले दामाद को गोश्त के लच्छे खिलातीं।
          ‘जमाना बड़ा खराब है बेटी!वो हमीदा को मुँह फुलाए देखकर कहा करतीं और वो सोचा करती- हम भूखे रहकर दामाद को खिला रहे हैं। बी-आपा सुबह-सवेरे उठकर मशीन की तरह जुट जाती हैं। निहार मुँह पानी का घूँट पीकर राहत के लिए परांठे तलती हैं। दूध औटाती हैं, ताकि मोटी सी बालाई पड़े। उसका बस नहीं था कि वो अपनी चर्बी निकालकर उन परांठों में भर दे। और क्यों न भरे, आखिर को वह एक दिन उसी का हो जाएगा। जो कुछ कमाएगा, उसी की हथेली पर रख देगा। फल देने वाले पौधे को कौन नहीं सींचता?
          फिर जब एक दिन फूल खिलेंगे और फूलों से लदी हुई डाली झुकेगी तो ये ताना देने वालियों के मुँह पर कैसा जूता पडेग़ा! और उस खयाल ही से बी-आपा के चेहरे पर सुहाग खेल उठता। कानों में शहनाइयाँ बजने लगतीं और वो राहत भाई के कमरे को पलकों से झाड़तीं। उसके कपडों को प्यार से तह करतीं, जैसे वे उनसे कुछ कहते हों। वो उनके बदबूदार, चूहों जैसे सड़े हुए मोजे धोतीं, बिसान्दी बनियान और नाक से लिपटे हुए रुमाल साफ करतीं। उसके तेल में चिपचिपाते हुए तकिए के गिलाफ पर स्वीट ड्रीम्स काढतीं। पर मामला चारों कोने चौकस नहीं बैठ रहा था। राहत सुबह अण्डे-परांठे डटके खाकर जाता और शाम को आकर कोफ्ते खाकर सो जाता। और बी-अम्मां की मुँहबोली बहन हाकिमाना अन्दाज में खुसर-पुसर करतीं।
          ‘बडा शर्मीला है बेचारा!बी-अम्मां तौलिए पेश करतीं। हाँ, ये तो ठीक है, पर भई कुछ तो पता चले रंग-ढंग से, कुछ आँखों से।‘ ‘अए नउज, ख़ुदा न करे मेरी लौंडिया आँखें लड़ाए, उसका आँचल भी नहीं देखा है किसी ने।बी-अम्मां फख्र से कहतीं। , तो परदा तुड़वाने को कौन कहे है!बी-आपा के पके मुँहासों को देखकर उन्हें बी-अम्मां की दूरंदेशी की दाद देनी पड़ती। ऐ बहन, तुम तो सच में बहुत भोली हो। ये मैं कब कहूँ हूँ? ये छोटी निगोड़ी क़ौन सी बकरीद को काम आएगी?’ वो मेरी तरफ देखकर हँसती, ‘अरी ओ नकचढ़ी! बहनोई से कोई बातचीत, कोई हँसी-मजाक!’ ‘उंह अरे चल दिवानी!’ ‘, तो मैं क्या करूँ खाला?’ ‘राहत मियाँ से बातचीत क्यों नहीं करती?’ ‘भइया हमें तो शर्म आती है।‘ ‘ए है, वो तुझे फाड़ ही तो खाएगा न?’ बी अम्मां चिढ़ाकर बोलतीं। नहीं तो, मगरमैं लाजवाब हो गयी। और फिर मिसकौट हुई। बडी सोच-विचार के बाद खली के कबाब बनाए गए। आज बी-आपा भी कई बार मुस्कुरा पडीं। चुपके से बोलीं, ‘देख हँसना नहीं, नहीं तो सारा खेल बिगड़ जाएगा।‘ ‘नहीं हँसूँगी।मैंने वादा किया।
          ‘खाना खा लीजिए।मैंने चौकी पर खाने की सेनी रखते हुए कहा। फिर जो पाटी के नीचे रखे हुए लोटे से हाथ धोते वक्त मेरी तरफ सिर से पाँव तक देखा तो मैं भागी वहाँ से। अल्लाह, तोबा! क्या
खूनी आँखें हैं!’ ‘जा निगोड़ी, मरी, अरी देख तो सही, वो कैसा मुँह बनाते हैं। ए है, सारा मजा किरकिरा हो जाएगा।आपा-बी ने एक बार मेरी तरफ देखा। उनकी आँखों में इल्तिजा थी, लुटी हुई बारातों का गुबार था और चौथी के पुराने जोड़ों की मन्द उदासी। मैं सिर झुकाए फिर खम्भे से लगकर खड़ी हो गयी।
          राहत खामोश खाते रहे। मेरी तरफ न देखा। खली के कबाब खाते देखकर मुझे चाहिए था कि मजाक उड़ाऊँ, कहकहे लगाऊँ कि वाह जी वाह, दूल्हा भाई, खली के कबाब खा रहे हो!मगर जानो किसी ने मेरा नरखरा दबोच लिया हो।
          बी-अम्मां ने मुझे जलकर वापस बुला लिया और मुँह ही मुँह में मुझे कोसने लगीं। अब मैं उनसे क्या कहती, कि वो मजे से खा रहा है कमबख्त! राहत भाई! कोफ्ते पसन्द आए?’ बी-अम्मां के सिखाने पर मैं ने पूछा। जवाब नदारद। बताइए न?’ ‘अरी ठीक से जाकर पूछ!बी-अम्मां ने टहोका दिया। आपने लाकर दिए और हमने खाए। मजेदार ही होंगे।‘ ‘अरे वाह रे जंगली!बी-अम्मां से न रहा गया। तुम्हें पता भी न चला, क्या मजे से खली के कबाब खा गए! खली के?’ ‘अरे तो रोज क़ाहे के होते हैं? मैं तो आदी हो चला हूँ खली और भूसा खाने का।
          बी-अम्मां का मुँह उतर गया। बी-अम्मां की झुकी हुई पलकें ऊपर न उठ सकीं। दूसरे रोज बी-आपा ने रोजाना से दुगुनी सिलाई की और फिर जब शाम को मैं खाना लेकर गयी तो बोले- कहिए आज क्या लायी हैं? आज तो लकड़ी क़े बुरादे की बारी है।‘ ‘क्या हमारे यहाँ का खाना आपको पसन्द नहीं आता?’ मैंने जलकर कहा। ये बात नहीं, कुछ अजीब-सा मालूम होता है। कभी खली के कबाब तो कभी भूसे की तरकारी।मेरे तन बदन में आग लग गयी। हम सूखी रोटी खाकर इसे हाथी की खुराक दें। घी टपकतप परांठे ठुसाएँ। मेरी बी-आपा को जुशांदा नसीब नहीं और इसे दूध मलाई निगलवाएँ। मैं भन्नाकर चली आयी।
          बी-अम्मां की मुँहबोली बहन का नुस्खा काम आ गया और राहत ने दिन का ज्यादा हिस्सा घर ही में गुज़ारना शुरु कर दिया। बी-आपा तो चूल्हे में जुटी रहतीं, बी-अम्मां चौथी के जोड़े सिया करतीं और राहत की गलीज आँखों के तीर मेरे दिल में चुभा करते। बात-बेबात छेड़ना, खाना खिलाते वक्त कभी पानी तो कभी नमक के बहाने। और साथ-साथ जुमलेबाजी! मैं खिसियाकर बी-आपा के पास जा बैठती। जी चाहता, किसी दिन साफ कह दूँ कि किसकी बकरी और कौन डाले दाना-घास! ऐ बी, मुझसे तुम्हारा ये बैल न नाथा जाएगा।मगर बी-आपा के उलझे हुए बालों पर चूल्हे की उड़ती हुई राख नहीं मेरा कलेजा धक् से हो गया। मैंने उनके सफेद बाल लट के नीचे छुपा दिए। नास जाए इस कमबख्त नजले का, बेचारी के बाल पकने शुरु हो गए।
          राहत ने फिर किसी बहाने मुझे पुकारा। उंह!मैं जल गयी। पर बी-आपा ने कटी हुई मुर्गी की
तरह जो पलटकर देखा तो मुझे जाना ही पड़ा। आप हमसे खफा हो गयीं?’ राहत ने पानी का कटोरा लेकर मेरी कलाई पकड़ ली। मेरा दम निकल गया और भागी तो हाथ झटककर। क्या कह रहे थे?’ बी-आपा ने शर्मो-हया से घुटी आवाज में कहा। मैं चुपचाप उनका मुँह ताकने लगी। कह रहे थे, किसने पकाया है खाना? वाह-वाह, जी चाहता है खाता ही चला जाऊँ। पकानेवाली के हाथ खा जाऊँ। ओह नहीं खा नहीं जाऊँ, बल्कि चूम लूँ।मैंने जल्दी-जल्दी कहना शुरु किया और बी-आपा का खुरदरा, हल्दी-धनिया की बसांद में सड़ा हुआ हाथ अपने हाथ से लगा लिया। मेरे आँसू निकल आए। ये हाथ! मैंने सोचा, जो सुबह से शाम तक मसाला पीसते हैं, पानी भरते हैं, प्याज काटते हैं, बिस्तर बिछाते हैं, जूते साफ करते हैं! ये बेकस गुलाम की तरह सुबह से शाम तक जुटे ही रहते हैं। इनकी बेगार कब खत्म होगी? क्या इनका कोई खरीदार न आएगा? क्या इन्हें कभी प्यार से न चूमेगा? क्या इनमें कभी मेंहदी न रचेगी? क्या इनमें कभी सुहाग का इतर न बसेगा? जी चाहा, जोर से चीख पडूँ।
          ‘और क्या कह रहे थे?’ बी-आपा के हाथ तो इतने खुरदरे थे पर आवाज इतनी रसीली और मीठी थी कि राहत के अगर कान होते तो, मगर राहत के न कान थे न नाक, बस दोजख़ ज़ैसा पेट था! और कह रहे थे, अपनी बी-आपा से कहना कि इतना काम न किया करें और जोशान्दा पिया करें।‘ ‘चल झूठी!’ ‘अरे वाह, झूठे होंगे आपके वो।’ ‘अरे, चुप मुरदार!उन्होंने मेरा मुँह बन्द कर दिया। देख तो स्वेटर बुन गया है, उन्हें दे आ। पर देख, तुझे मेरी कसम, मेरा नाम न लीजो।‘ ‘नहीं बी-आपा! उन्हें न दो वो स्वेटर। तुम्हारी इन मुट्ठी भर हड्डियों को स्वेटर की कितनी जरूरत है?’ मैंने कहना चाहा पर न कह सकी। आपा-बी, तुम खुद क्या पहनोगी?’ ‘अरे, मुझे क्या जरूरत है, चूल्हे के पास तो वैसे ही झुलसन रहती है।


          स्वेटर देखकर राहत ने अपनी एक आई-ब्रो शरारत से ऊपर तानकर कहा- क्या ये स्वेटर आपने बुना है?’ ‘नहीं तो।‘ ‘तो भई हम नहीं पहनेंगे।मेरा जी चाहा कि उसका मुँह नोच लूँ। कमीने मिट्टी के लोंदे! ये स्वेटर उन हाथों ने बुना है जो जीते-जागते गुलाम हैं। इसके एक-एक फन्दे में किसी नसीबोंजली के अरमानों की गरदनें फंसी हुई हैं। ये उन हाथों का बुना हुआ है जो नन्हें पगोड़े झुलाने के लिए बनाए गए हैं। उनको थाम लो गधे कहीं के और ये जो दो पतवार बड़े से बड़े तूफान के थपेड़ों से तुम्हारी जिन्दगी की नाव को बचाकर पार लगा देंगे। ये सितार की गत न बजा सकेंगे। मणिपुरी और भरतनाटयम की मुद्रा न दिखा सकेंगे, इन्हें प्यानो पर रक्स करना नहीं सिखाया गया, इन्हें फूलों से खेलना नहीं नसीब हुआ, मगर ये हाथ तुम्हारे जिस्म पर चरबी चढाने के लिए सुबह शाम सिलाई करते हैं, साबुन और सोडे में डुबकियाँ लगाते हैं, चूल्हे की आँच सहते हैं। तुम्हारी गलाजतें धोते हैं। इनमें चूडियाँ नहीं खनकती हैं। इन्हें कभी किसी ने प्यार से नहीं थामा।
          मगर मैं चुप रही। बी-अम्मां कहती हैं, मेरा दिमाग तो मेरी नई-नई सहेलियों ने खराब कर दिया है। वो मुझे कैसी नई-नई बातें बताया करती हैं। कैसी डरावनी मौत की बातें, भूख की और काल की बातें। धड़क़ते हुए दिल के एकदम चुप हो जाने की बातें।
          ‘ये स्वेटर तो आप ही पहन लीजिए। देखिए न आपका कुरता कितना बारीक है!जंगली बिल्ली की तरह मैंने उसका मुँह, नाक, गिरेबान नोच डाले और अपनी पलंगड़ी पर जा गिरी। बी-आपा ने आखिरी रोटी डालकर जल्दी-जल्दी तसले में हाथ धोए और आँचल से पोंछती मेरे पास आ बैठीं। वो बोले?’ उनसे न रहा गया तो धड़क़ते हुए दिल से पूछा। बी-आपा, ये राहत भाई बड़े ख़राब आदमी हैं।मैंने सोचा, ‘मैं आज सब कुछ बता दूँगी।‘ ‘क्यों?’ वो मुस्कुराईं। मुझे अच्छे नहीं लगते। देखिए, मेरी सारी चूड़ियाँ चूर हो गईं!मैंने काँपते हुए कहा। बडे शरीर हैं!उन्होंने रोमान्टिक आवाज में शरमाकर कहा। बी-आपा, सुनो बी-आपा! ये राहत अच्छे आदमी नहीं।मैं ने सुलगकर कहा। आज मैं बी-अम्मां से कह दूँगी।‘ ‘क्या हुआ?’ बी-अम्मां ने जानमाज बिछाते हुए कहा। देखिए मेरी चूड़ियाँ बी-अम्मां! राहत ने तोड़ ड़ालीं?’ बी-अम्मां मसर्रत से चहककर बोलीं। हाँ! खूब किया! तू उसे सताती भी तो बहुत है। ए है, तो दम काहे को निकल गया! बडी मोम की नमी हुई हो कि हाथ लगाया और पिघल गयीं!फिर चुमकार कर बोलीं, ‘खैर, तू भी चौथी में बदला ले लीजियो, कसर निकाल लियो कि याद ही करें मियाँ जी!ये कहकर उन्होंने नियत बाँध ली। मुँहबोली बहन से फिर कॉनफ्रेन्स हुयी और मामले को उम्मीद-अफ्ज़ा रास्ते पर गामजन देखकर अज़हद खुशनूदी से मुस्कुराया गया।
          ‘ऐ है, तू तो बड़ी ही ठस है। ऐ, हम तो अपने बहनोइयों का, खुदा की कसम, नाक में दम कर दिया करते थे।और वो मुझे बहनोइयों से छेड़छाड़ क़े हथकण्डे बताने लगीं कि किस तरह सिर्फ छेड़छाड़ क़े तीरन्दाज नुस्खे से उन दो ममेरी बहनों की शादी करायी, जिनकी नाव पार लगने के सारे मौके हाथ से निकल चुके थे। एक तो उनमें से हकीम जी थे। जहाँ बेचारे को लड़क़ियाँ-बालियाँ छेड़तीं, शरमाने लगते और शरमाते-शरमाते एख्तेलाज क़े दौरे पड़ने लगते। और एक दिन मामू साहब से कह दिया कि मुझे गुलामी में ले लीजिए। दूसरे वायसराय के दफ्तर में क्लर्क थे। जहाँ सुना कि बाहर आए हैं, लड़क़ियाँ छेड़ना शुरु कर देती थीं। कभी गिलौरियों में मिर्चें भरकर भेज दें, कभी सेवंईंयों में नमक डालकर खिला दिया।
          ए लो, वो तो रोज आने लगे। आँधी आए, पानी आए, क्या मजाल जो वो न आएँ। आखिर एक दिन कहलवा ही दिया। अपने एक जान-पहचान वाले से कहा कि उनके यहाँ शादी करा दो। पूछा कि भई किससे? तो कहा, किसी से भी करा दो। और खुदा झूठ न बुलवाए तो बड़ी बहन की सूरत थी कि देखो तो जैसे बैंचा चला आता है। छोटी तो बस सुब्हान अल्लाह! एक आँख पूरब तो दूसरी पच्छम। पन्द्रह तोले सोना दिया बाप ने और साहब के दफ्तर में नौकरी अलग दिलवायी। हाँ भई, जिसके पास पन्द्रह तोले सोना हो और बड़े साहब के दफ्तर की नौकरी, उसे लड़क़ा मिलते देर लगती है?’ बी-अम्मां ने ठण्डी साँस भरकर कहा। ये बात नहीं है बहन। आजकल लड़क़ों का दिल बस थाली का बैंगन होता है। जिधर झुका दो, उधर ही लुढक़ जाएगा।
          ‘मगर राहत तो बैंगन नहीं अच्छा-खासा पहाड़ है। झुकाव देने पर कहीं मैं ही न फँस जाऊँ’, मैंने
सोचा। फिर मैंने आपा की तरफ देखा। वो खामोश दहलीज पर बैठी, आटा गूँथ रही थीं और सब कुछ सुनती जा रही थीं। उनका बस चलता तो जमीन की छाती फाड़क़र अपने कुंवारेपन की लानत समेत इसमें समा जातीं।
          क्या मेरी आपा मर्द की भूखी हैं? नहीं, भूख के अहसास से वो पहले ही सहम चुकी हैं। मर्द का तसव्वुर इनके मन में एक उमंग बनकर नहीं उभरा, बल्कि रोटी-कपड़े क़ा सवाल बनकर उभरा है। वो एक बेवा की छाती का बोझ हैं। इस बोझ को ढकेलना ही होगा।
          मगर इशारों-कनायों के बावज़ूद भी राहत मियाँ न तो खुद मुँह से फूटे और न उनके घर से पैगाम आया। थक हार कर बी-अम्मां ने पैरों के तोड़े ग़िरवी रखकर पीर मुश्किलकुशा की नियाज दिला डाली। दोपहर भर मुहल्ले-टोले की लड़क़ियाँ सहन में ऊधम मचाती रहीं। बी-आपा शरमाती-लजाती मच्छरों वाली कोठरी में अपने खून की आखिरी बूँदें चुसाने को जा बैठीं। बी-अम्मां कमजोरी में अपनी चौकी पर बैठी चौथी के जोड़े में आखिरी टाँके लगाती रहीं। आज उनके चेहरे पर मंजिलों के निशान थे। आज मुश्किलकुशाई होगी। बस आँखों की सुईयाँ रह गयी हैं, वो भी निकल जाएँगी। आज उनकी झुर्रियों में फिर मुश्किल थरथरा रही थी। बी-आपा की सहेलियाँ उनको छेड़ रही थीं और वो खून की बची-खुची बूँदों को ताव में ला रही थीं। आज कई रोज से उनका बुखार नहीं उतरा था। थके हारे दिए की तरह उनका चेहरा एक बार टिमटिमाता और फिर बुझ जाता। इशारे से उन्होंने मुझे अपने पास बुलाया। अपना आँचल हटाकर नियाज क़े मलीदे की तश्तरी मुझे थमा दी। इस पर मौलवी साहब ने दम किया है। उनकी बुखार से दहकती हुई गरम-गरम सांसें मेरे कान में लगीं।


          तश्तरी लेकर मैं सोचने लगी- मौलवी साहब ने दम किया है। ये मुकद्दस मलीदा अब राहत के पेट में झौंका जाएगा। वो तन्दूर जो छ: महीनों से हमारे खून के छींटों से गरम रखा गया; ये दम किया हुआ मलीदा मुराद बर लाएगा। मेरे कानों में शादियाने बजने लगे। मैं भागी-भागी कोठे से बारात देखने जा रही हूँ। दूल्हे के मुँह पर लम्बा सा सेहरा पड़ा है, जो घोड़े क़ी अयालों को चूम रहा है। चौथी का शहानी जोड़ा पहने, फूलों से लदी, शर्म से निढाल, आहिस्ता-आहिस्ता कदम तोलती हुई बी-आपा चली आ रही हैं चौथी का जरतार जोड़ा झिलमिल कर रहा है। बी-अम्मां का चेहरा फूल की तरह खिला हुआ है। बी-आपा की हया से बोझिल निगाहें एक बार ऊपर उठती हैं। शुकराने का एक आँसू ढलककर अफ्शां के जर्रों में कुमकुमे की तरह उलझ जाता है। ये सब तेरी मेहनत का फल है। बी-आपा कह रही हैं।
          हमीदा का गला भर आया, ‘जाओ न मेरी बहनो!बी-आपा ने उसे जगा दिया और चौंककर ओढ़नी के आँचल से आँसू पौंछती ड्योढ़ी क़ी तरफ बढ़ी। ये मलीदा’, उसने उछलते हुए दिल को काबू में रखते हुए कहा। उसके पैर लरज रहे थे, जैसे वो साँप की बांबी में घुस आयी हो। फिर पहाड़ ख़िसका
और मुँह खोल दिया। वो एक कदम पीछे हट गयी। मगर दूर कहीं बारात की शहनाइयों ने चीख लगाई, जैसे कोई दिन का गला घोंट रहा हो। काँपते हाथों से मुकद्दस मलीदे का निवाला बनाकर सने राहत के मुँह की तरफ बढ़ा दिया।
          एक झटके से उसका हाथ पहाड़ क़ी खोह में डूबता चला गया। नीचे तअफ्फ़ुन और तारीकी से अथाह ग़ार की गहराइयों में एक बड़ी सी चट्टान ने उसकी चीख को घोंटा। नियाज मलीदे की रकाबी हाथ से छूटकर लालटेन के ऊपर गिरी और लालटेन ने जमीन पर गिरकर दो चार सिसकियाँ भरीं और गुल हो गयी। बाहर आँगन में मुहल्ले की बहू-बेटियाँ मुश्किलकुशा (हजरत अली) की शान में गीत गा रही थीं।


          सुबह की गाड़ी से राहत मेहमाननवाज़ी का शुक्रिया अदा करता हुआ चला गया। उसकी शादी की तारीख तय हो चुकी थी और उसे जल्दी थी। उसके बाद इस घर में कभी अण्डे तले न गए, परांठे न सिकें और स्वेटर न बुने। दिक ज़ो एक अरसे से बी-आपा की ताक में भागी पीछे-पीछे आ रही थी, एक ही जस्त में उन्हें दबोच बैठी और उन्होंने अपना नामुराद वजूद चुपचाप उसकी आगोश में सौंप दिया।
          और फिर उसी सहदरी में साफ-सुथरी जाजम बिछाई गई। मुहल्ले की बहू-बेटियाँ जुडीं। क़फन का सफेद-सफेद लट्ठा मौत के आँचल की तरह बी-अम्मां के सामने फैल गया। तहम्मुल के बोझ से उनका चेहरा लरज रहा था। बायीं आई-ब्रो फड़क़ रही थी। गालों की सुनसान झुर्रियाँ भाँय-भाँय कर रही थीं, जैसे उनमें लाखों अजदहे फुँकार रहे हों।
          लट्ठे के कान निकालकर उन्होंने चौपरत किया और उनके फिल में अनगिनत कैंचियाँ चल गयीं। आज उनके चेहरे पर भयानक सुकून और हरा-भरा इत्मीनान था, जैसे उन्हें पक्का यकीन हो कि दूसरे जोड़ों की तरह चौथी का यह जोड़ा न सेंता जाए।



          एकदम सहदरी में बैठी लड़क़ियाँ-बालियाँ मैनाओं की तरह चहकने लगीं। हमीदा माँजी को दूर झटककर उनके साथ जा मिली। लाल टूल पर सफेद गज़ी का निशान! इसकी सुर्खी में न जाने कितनी मासूम दुल्हनों का सुहाग रचा है और सफेदी में कितनी नामुराद कुंवारियों के कफन की सफेदी डूबकर उभरी है। और फिर सब एकदम खामोश हो गए। बी-अम्मां ने आखिरी टाँका भरके डोरा तोड़ लिया। दो मोटे-मोटे आँसू उनके रूई जैसे नरम गालों पर धीरे-धीरे रैंगने लगे। उनके चेहरे की शिकनों में से रोशनी की किरनें फूट निकलीं और वो मुस्कुरा दीं, जैसे आज उन्हें इत्मीनान हो गया कि उनकी कुबरा का सुआ जोड़ा बनकर तैयार हो गया हो और कोए-ए-अदम में शहनाइयाँ बज उठेंगी।

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